जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे में सदियों पुरानी परंपरा ‘बाहर रैनी’ की रस्म पूरी गरिमा और उत्साह के साथ संपन्न हुई। ‘भीतर रैनी’ के बाद माड़िया जनजाति के लोगों ने आठ चक्कों वाले विशाल विजय रथ को शहर से दूर लालबाग स्थित कुम्हड़ाकोट के जंगलों में छिपा दिया था। बस्तर दशहरे की इस अनूठी परंपरा में रथ को प्रतीकात्मक रूप से चुराया जाता है, जो राजा और प्रजा के बीच आपसी संवाद, अपनत्व और मान-मनौव्वल का प्रतीक है।
गुरुवार को ‘बाहर रैनी’ की रस्म के दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य रथ को वापस लाने के लिए कुम्हड़ाकोट पहुंचे। वहां उन्होंने माड़िया समाज के लोगों और ग्रामीणों से मुलाकात कर पारंपरिक तरीके से मान-मनौव्वल की। ग्रामीणों के साथ आत्मीय संवाद के बाद दोनों पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण माहौल बना और रथ की वापसी का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस अवसर पर जंगल में पारंपरिक नवाखानी की रस्म भी निभाई गई। नई फसल के आगमन की खुशी में नए चावल से बनी खीर का नैवेद्य अर्पित किया गया। राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव, सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, महापौर संजय पाण्डे और ग्रामीणों ने एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। इस परंपरा ने बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समरसता की झलक प्रस्तुत की।
मान-मनौव्वल और नवाखानी की रस्म पूरी होने के बाद माड़िया समुदाय के लोगों और राजपरिवार के सदस्यों ने पारंपरिक गाजे-बाजे और जयकारों के साथ विशाल विजय रथ को वापस राजमहल के सिंह द्वार तक पहुंचाया। इसके साथ ही बस्तर दशहरे की बहुप्रतीक्षित रथ परिक्रमा से जुड़ी ‘बाहर रैनी’ की रस्म संपन्न हुई।
