बस का बढ़ा किराया!- गिरीश पंकज

Follow Us

छत्तीसगढ़ के बस मालिकों ने आम यात्रियों पर अभी जो बोझ डाला है, वह विस्मयदेह चिंतित कर देने वाला है. बस किराए में पचहत्तर प्रतिशत वृद्धि करना बड़ा अत्याचार है. और आश्चर्य की बात यह है कि छत्तीसगढ़ की सरकार की ओर से कोई कड़ी कार्रवाई की खबर नहीं आ रही है. लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि जिसके मन में जो आए, वह कर सकता है. ऐसा भी नहीं है कि अचानक पेट्रोल या डीजल की कीमतों में अभी अचानक इजाफा हो गया. कीमतें घटती भी रहती हैं. कुछ महीने पहले ईरान-इजराइल के बीच युद्ध की नौबत के कारण पेट्रोल की कीमतों में अपने देश में पेट्रोल, डीजल की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी जरूर हुई थी लेकिन इतनी भी नहीं हुई की बस मालिक 75% का इजाफा करके टिकट को महंगा कर दें. रायपुर से जो व्यक्ति अभी 133 रुपए में यात्रा करता था अब उसे 228 रुपए देने होंगे. जगदलपुर के लिए पहले रु. 300 किराया था, अब वह बढ़कर 521 रुपए हो गया है. अंबिकापुर के लिए 313 रुपए लगते थे, अब 543 लगेंगे. अन्य कस्बों तक जाने वाली बसों के भाड़े में भी वृद्धि हो गई है. जशपुर का किराया 467 रुपए था, जो अब सीधे 813 रुपए हो गया है. यह अपने आप में एक बड़ी अंधेरगर्दी है. इसमें दो राय नहीं कि छत्तीसगढ़ में भी अब शायद बस-माफिया सक्रिय हो गए हैं. उनको पता है कि सरकार कुछ नहीं कर सकती. इसलिए मनमाना खेल चल रहा है. किराया बढ़ाने की मंजूरी देने वाले परिवहन विभाग के अफसर ही हैं, जो कभी बस की यात्रा नहीं करते. या तो ट्रेन के वातानुकूलित कूपे में सफर करते हैं या फिर अपनी महंगी कारों से छत्तीसगढ़ का भ्रमण करते हैं. ऐसे अधिकारी ही किराया बढ़ोतरी की मंजूरी देते हैं, जिन्हें आम आदमी की परेशानी से कोई लेना-देना नहीं. उन्हें बस मालिकों को लाभ पहुंचाना है बस ! और यह किसी से छिपा नहीं है कि लाभ पहुंचाने के पीछे क्या खेल चलता है. इसे स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं है. समझ में नहीं आता कि सरकार बदलने वाले मंत्रा-विधायक किस लिए चुने जाते हैं? स्वाभाविक है कि ये लोग सिर्फ भोग-विलास के लिए नहीं चुने जाते. ये जनता की सेवा के लिए चुने जाते हैं. अब सेवा का अवसर आया है, जब बस का सफर इतना महंगा हो गया है, तब जनप्रतिनिधियों को इसका विरोध करना चाहिए. टिकट में जो 75% बढ़ोतरी की गई है, उसे वापस लेने पर दबाव बनाना चाहिए. किराए में केवल मामूली बढ़त होनी चाहिए, जो न्याय संगत लगे. रू. 1 का आधा रु. 1.10 पैसे कर दें, 15 पैसे कर दें तो भी समझ में आता है, लेकिन रू. 1 से बढ़कर सीधे सीधे दो रुपए कर देना आम लोगों की जेब पर डाका डालने की तरह है. उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार और परिवहन विभाग इस मामले को गंभीरता से देखेगा, और बस ऑपरेटरों द्वारा बढ़ा हुआ किराया वापस लेने का आदेश जारी होगा. अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो उन पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए. रोज की यात्रा करने वाले नागरिकों का भी दायित्व है कि वे इसका विरोध करें. बढ़ा हुआ किराया वापस लेने के लिए आंदोलन करने की नौबत आए तो वह भी करें.