नई दिल्ली। शून्य यानी Zero के बिना आज की दुनिया की कल्पना करना मुश्किल है। कंप्यूटर से लेकर बैंकिंग और आधुनिक तकनीक तक, हर जगह इसका महत्व है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि, भारत के एक प्राचीन मंदिर में शून्य के बेहद पुराने लिखित प्रमाण मिलते हैं। मध्य प्रदेश के ग्वालियर किले में स्थित चतुर्भुज मंदिर इसी वजह से खास पहचान रखता है।
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पत्थरों पर दर्ज है शून्य:
भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर गुर्जर-प्रतिहार काल में करीब 9वीं शताब्दी में बनाया गया था। मंदिर की दीवार पर संस्कृत में अंकित एक शिलालेख में 270 और 50 जैसी संख्याएं दर्ज हैं। इनमें शून्य के संकेत दिखाई देते हैं। इसी वजह से इसे लंबे समय तक दुनिया में अंकित शून्य के सबसे पुराने प्रमाणों में प्रमुख स्थान मिला।
फिर क्यों बदला ‘सबसे पुराने जीरो’ का दावा?:
वर्ष 2017 के बाद इस दावे को नई जानकारी से चुनौती मिली। कंबोडिया में मिले 7वीं शताब्दी के K-127 शिलालेख में शून्य का इस्तेमाल अंक के रूप में पाया गया। इसके बाद ग्वालियर मंदिर से जुड़े शून्य को दुनिया का सबसे पुराना अंकित शून्य मानने की धारणा बदल गई।
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भारत और शून्य का रिश्ता:
ग्वालियर का मंदिर भले ही सबसे पुराने लिखित शून्य का खिताब न रखता हो, लेकिन यह भारतीय गणित के गौरवशाली इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी है। शोधों के अनुसार, भारत में शून्य की अवधारणा और उसके गणितीय इस्तेमाल का विकास कई सदियों पहले शुरू हो चुका था। यही वजह है कि, ग्वालियर का यह मंदिर इतिहास, गणित और भारतीय ज्ञान परंपरा-तीनों का अनोखा संगम माना जाता है।

