दुनिया के सबसे प्रभावशाली सैन्य गठबंधनों में एक माना जाने वाला संगठन नाटो आज ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां उसे एक साथ कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, रक्षा खर्च बढ़ाने का दबाव, सदस्य देशों के बीच रणनीतिक मतभेद, चीन की बढ़ती वैश्विक भूमिका और बदलता सुरक्षा परिदृश्य नाटो के सामने नई जटिलताएं खड़ी कर रहे हैं। ऐसे समय में गठबंधन की सबसे बड़ी परीक्षा उसकी एकजुटता और सामूहिक निर्णय क्षमता बन गई है। और जब से अमेरिका की कमान ट्रंप के हाथों में आई है, तब से तो अनिश्चितता और बढ़ गई है। फरवरी 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला किए जाने के बाद यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह बदल गई। नाटो ने अपनी पूर्वी सीमाओं पर सैन्य तैनाती बढ़ाई, सदस्य देशों की रक्षा तैयारियों को मजबूत किया और यूक्रेन को व्यापक सैन्य एवं राजनीतिक समर्थन दिया। हालांकि, युद्ध लंबा खिंचने के कारण सदस्य देशों पर आर्थिक और सैन्य दबाव भी बढ़ा है। नाटो लंबे समय से अपने सदस्य देशों से रक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम 2 प्रतिशत खर्च करने की अपेक्षा करता रहा है। लेकिन कई देशों के लिए यह लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं रहा। बढ़ती महंगाई, आर्थिक चुनौतियों और घरेलू राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण रक्षा खर्च बढ़ाने को लेकर कई सरकारों पर दबाव है। इससे गठबंधन के भीतर जिम्मेदारियों के समान बंटवारे को लेकर बहस तेज हुई है। हालांकि नाटो सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत पर आधारित है, लेकिन सभी सदस्य देशों की प्राथमिकताएं समान नहीं हैं। पूर्वी यूरोप के देश रूस को सबसे बड़ा खतरा मानते हैं, जबकि कुछ पश्चिमी सदस्य देश इंडो-पैसिफिक क्षेत्र, आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और प्रवासन जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान देने की वकालत करते हैं। इन अलग-अलग प्राथमिकताओं के कारण कई बार साझा रणनीति बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। नाटो का गठन मुख्य रूप से यूरो-अटलांटिक सुरक्षा के लिए हुआ था, लेकिन अब चीन की तकनीकी, आर्थिक और सैन्य क्षमता में वृद्धि को भी गठबंधन दीर्घकालिक चुनौती के रूप में देख रहा है। हालांकि इस मुद्दे पर भी सभी सदस्य देशों का दृष्टिकोण एक जैसा नहीं है, क्योंकि कई देशों के चीन के साथ महत्वपूर्ण व्यापारिक और आर्थिक संबंध हैं। नाटो के लिए नई सुरक्षा चुनौतियां भी बढ़ीं हैं। पारंपरिक युद्ध के अलावा साइबर हमले, कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानि एआई, अंतरिक्ष सुरक्षा, दुष्प्रचार अभियान, महत्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना की सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति जैसे नए खतरे नाटो की रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं। इन क्षेत्रों में समन्वित नीति तैयार करना गठबंधन के लिए लगातार कठिन होता जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नाटो अपनी एकता बनाए रख पाएगा? विशेषज्ञों का मानना है कि नाटो की सबसे बड़ी ताकत उसकी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था और सदस्य देशों की राजनीतिक एकजुटता है। लेकिन यदि रक्षा खर्च, रणनीतिक प्राथमिकताओं और वैश्विक चुनौतियों को लेकर मतभेद बढ़ते हैं, तो गठबंधन की निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, रूस-यूक्रेन युद्ध और बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल ने यह भी दिखाया है कि साझा सुरक्षा हित सदस्य देशों को एक मंच पर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नाटो आज केवल सैन्य गठबंधन नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ कहा जा सकता है। इसका एक अपना महत्व भी है, लेकिन कहा जा सकता है कि वर्तमान परिस्थितियों और ट्रंप की चेतावनियों के चलते यह अपने कठिनतम दौर से गुजर रहा है। आने वाले वर्षों में उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह सदस्य देशों के बीच मतभेदों को कितनी प्रभावी ढंग से संभालता है, नई सुरक्षा चुनौतियों के अनुरूप खुद को कितना तेज़ी से ढालता है और अपनी सामूहिक एकता को कितनी मजबूती से बनाए रख पाता है।
नाटो: एक गठबंधन, कई चुनौतियां- संजय सक्सेना
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