पर्यटन की नई परिभाषा: अब भक्ति और सैर-सपाटे में कोई अंतर नहीं

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उत्तराखंड सरकार के अनुसार गत वर्ष राज्य में पर्यटकों का आगमन 6 करोड़ पार कर गया, जो कुल आबादी से छह गुना अधिक है। ‘इंडिया टूरिज्म कम्पोडियम 2025’ के आंकड़ों पर गौर करें तो यह आंकड़ा कोई मायाबी नहीं हैं। दरअसल संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन की परिभाषा के आधार पर ही ये आंकड़े तैयार किये गये हैं। उन्हीं आंकड़ों के अनुसार गत वर्ष उत्तर प्रदेश में 64.6 करोड़ और तमिलनाडु में 30 करोड़ से अधिक पर्यटक पधारे थे। ये भारी भरकम आंकड़े सरकारी फाइलों में सफलता के प्रमाणपत्र की तरह पेश किए जाते हैं, लेकिन इनकी गहराई में उतरते ही एक गंभीर विरोधाभास भी सामने आता है। क्या विशाल भीड़ वास्तव में वह ‘पर्यटक’ है जिससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है, या यह केवल एक सांख्यिकीय भ्रम है? ‘संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन’ के मानक ‘पर्यटक’ की परिभाषा को इतना व्यापक बना देते हैं कि इसमें श्रद्धा और सैर-सपाटे के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति अपने सामान्य निवास स्थान से बाहर 24 घंटे से अधिक रुकता है, तो उसे पर्यटक माना जाएगा, चाहे उद्देश्य धार्मिक हो या मनोरंजन।

इन्हीं मानकों की ओट में भारतीय राज्य कांवड़ियों और साधुओं को भी ‘पर्यटक’ की श्रेणी में दर्ज कर लेते हैं। यहीं से उस धारणा को चुनौती देने की आवश्यकता है जो संख्यात्मक बहुलता को आर्थिक समृद्धि का पर्याय मान लेती है। वास्तव में पर्यटक और तीर्थयात्री के उद्देश्य और खर्च करने की क्षमता में मौलिक अंतर होता है। पर्यटक होटलों में रुकता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था में ‘लिक्विड कैश’ का संचार करता है। इसके विपरीत, पारंपरिक तीर्थयात्री अक्सर अपना भोजन साथ लेकर चलते हैं और उनकी यात्रा का उद्देश्य मानसिक शांति होती है, न कि आर्थिक उपभोग। जब हम इन दोनों श्रेणियों को एक ही तराजू में तौलते हैं, तो नीतिगत स्तर पर भारी चूक होने की संभावना बढ़ जाती है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में जहाँ तीर्थाटन का बोलबाला है, वहां की अवसंरचना पर पड़ने वाला दबाव इन करोड़ों नवागन्तुकों की भीड़ से तय होता है, लेकिन उस दबाव को झेलने के लिए मिलने वाला राजस्व उस अनुपात में नहीं होता।

उदाहरण के तौर पर, कांवड़ यात्रा के दौरान लाखों की भीड़ के लिए प्रशासन को सफाई, सुरक्षा और स्वास्थ्य की जो व्यवस्था करनी पड़ती है, उसका वित्तीय बोझ करदाताओं की जेब पर पड़ता है, जबकि उस भीड़ से होने वाला प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ न्यूनतम होता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हम केवल संख्या गिनने के लिए अपनी पारिस्थितिकी और संसाधनों को दांव पर लगा रहे हैं? गत 1 फरवरी 2026 को प्रस्तुत किए गए केंद्रीय बजट में भी ‘‘पर्यटन के व्यापक विकास’’ और ‘‘आध्यात्मिक पर्यटन’’ पर जोर दिया गया है। बजट में राज्यों को ब्याज मुक्त ऋण और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए प्रोत्साहन की बात कही गई है, लेकिन यहाँ यह समझना जरूरी है कि ‘‘विकास’’ का मॉडल क्या हो? यदि बजट का निवेश केवल ऐसी बुनियादी संरचनाओं पर होता है जो साल में केवल कुछ महीने की तीर्थयात्रा की भीड़ को संभालने के लिए हैं, तो शेष दस महीने वह निवेश मृत प्राय हो जाता है। तर्कपूर्ण ढंग से देखें तो पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के लिए आवश्यक अवसंरचना भी पूरी तरह भिन्न होती है। एक हाई-वैल्यू पर्यटक को बेहतर कनेक्टिविटी, स्वच्छता, निजी स्थान और उच्च स्तरीय आतिथ्य की आवश्यकता होती है।

यदि किसी गंतव्य पर तीर्थयात्रियों की अनियंत्रित भीड़ होगी, तो वह स्थान वास्तविक पर्यटकों के लिए अपनी अपील खो देगा। इसे ‘‘क्राउडिंग आउट इफेक्ट’’ कहा जा सकता है, जहाँ कम खर्च करने वाली भीड़ अधिक खर्च करने वाले पर्यटकों को विस्थापित कर देती है। संवेदनशील हिमालयी राज्यों के लिए यह स्थिति और भी भयावह है। यहाँ की ‘‘वहन क्षमता’’ सीमित है। करोड़ों की संख्या कागजों पर अच्छी लग सकती है, लेकिन क्या हमारे पहाड़, हमारी नदियाँ और हमारे शहर इतने लोगों का कचरा और उनकी जरूरतों का बोझ उठाने में सक्षम हैं?

इस विमर्श को व्यापक फलक पर देखें तो हमें राजस्व के आंकड़ों का गहन विश्लेषण करना होगा। क्या हम ऐसे आंकड़े सार्वजनिक कर सकते हैं जो यह बताएं कि प्रति व्यक्ति पर्यटक से राज्य को कितनी आय हुई? अक्सर देखा गया है कि जिस राज्य में पर्यटकों की संख्या सबसे अधिक होती है, जरूरी नहीं कि पर्यटन से होने वाली आय में भी वह राज्य अव्वल हो। केरल जैसे राज्य ने इस मामले में एक अलग लकीर खींची है, जहाँ संख्या के बजाय ‘वैल्यू’ पर ध्यान दिया जाता है। वहां तीर्थयात्री भी आते हैं, लेकिन राज्य की ब्रांडिंग ‘‘गॉड्स ओन कंट्री’’ के रूप में एक विशिष्ट पर्यटक वर्ग को आकर्षित करने के लिए की गई है। इसके उलट, उत्तर भारत के राज्यों में पर्यटन नीति अक्सर ‘‘संख्या आधारित’’ होकर रह गई है। सांख्यिकीय जादूगरी का यह आलम है कि यदि एक व्यक्ति अपनी यात्रा के दौरान तीन अलग-अलग जिलों में रुकता है, तो उसे तीन पर्यटक मान लिया जाता है।

सामयिक परिप्रेक्ष्य में, यदि हम 2026 के बजट के लक्ष्यों को वास्तव में प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें अपनी पर्यटन नीति को ‘परिमाण‘ से हटाकर ‘गुणवत्ता’ पर केंद्रित करना होगा। बजट में घोषित ‘पर्यटन केंद्रों की रैंकिंग’ की योजना तभी सफल होगी जब रैंकिंग के मानदंडों में केवल फुटफॉल (आगंतुकों की संख्या) को ही पैमाना न बनाया जाए, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, प्रति व्यक्ति राजस्व और आगंतुक के अनुभव को भी शामिल किया जाए। तीर्थयात्रियों के लिए अलग प्रबंधन और पर्यटकों के लिए अलग विपणन रणनीति समय की मांग है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि एक नंगे पांव चलने वाला श्रद्धालु और एक बैकपैक लेकर चलने वाला पर्यटक, दोनों ही हमारे देश की सांस्कृतिक विविधता के हिस्से हैं, लेकिन आर्थिक नियोजन में दोनों की भूमिकाएं भिन्न हैं। आगन्तुकों की बाढ़ किसी राज्य की सफलता का पैमाना नहीं, बल्कि एक चेतावनी होना चाहिए। यह चेतावनी है संसाधनों के दोहन, अनियोजित शहरीकरण की और उस नीतिगत अंधेपन की है जो श्रद्धा को निवेश समझ बैठा है। हमें विश्व र्प्यटन संगठन के मानकों की अपनी परिस्थितियों के अनुसार व्याख्या करनी होगी।

जब तक हम आगंतुक के उद्देश्य और उसके आर्थिक व्यवहार के आधार पर वर्गीकरण नहीं करेंगे, तब तक हमारा पर्यटन ढांचा केवल भीड़ प्रबंधन का एक जरिया बना रहेगा, न कि टिकाऊ विकास का इंजन। वास्तविक सफलता तब नहीं होगी जब हम करोड़ों लोगों को बुलाएंगे, बल्कि तब होगी जब हम आए हुए लोगों से राज्य की प्रगति में वास्तविक और सार्थक योगदान सुनिश्चित करवा सकेंगे। डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।