दुनिया के तमाम देश पृथ्वी के आसपास जितनी तेजी से उपग्रह भेज रहे हैं, यह रफ्तार अब चिंताजनक होने लगी है। वैज्ञानिकों ने इस रफ्तार को कम करने की सलाह देते हुए चेतावनी भी दी है। लेकिन इस क्षेत्र में देश तो ठीक, अब निजी कंपनियां भी उतर आई हैं, यह भविष्य के लिए गंभीर मामला बनता जा रहा है। सदियों से इंसान जिस तारों भरे आसमान को विस्मय और जिज्ञासा के साथ देखता आया है, क्या वह आने वाले वर्षों में पूरी तरह बदल सकता है? कुछ ऐसा ही होने वाला है। असल में पृथ्वी की निचली कक्षा में बड़ी संख्या में नए उपग्रहों और विशाल अंतरिक्ष दर्पणों को भेजने की प्रस्तावित योजनाओं ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। उनका कहना है कि यदि इन परियोजनाओं पर बिना किसी प्रभावी नियंत्रण के अमल हुआ तो रात का प्राकृतिक अंधकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगेगा, दूरस्थ आकाशगंगाओं, पृथ्वी जैसे ग्रहों और ब्रह्मांड की खोज को बाधित कर सकती है। यही नहीं, इससे हमारे वायुमंडल का नजारा भी बदल जाएगा। यूरोपियन सदर्न ऑब्जर्वेटरी यानि ईएसओ के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में एक अध्ययन कया गया है। इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित शोध पत्रिका एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन बताया गया है कि पृथ्वी की कक्षा में किसी भी समय अधिकतम लगभग 1 लाख अपेक्षाकृत मंद उपग्रह ही होने चाहिए। लेकिन इसके विपरीत विभिन्न कंपनियों और संस्थाओं की मौजूदा प्रस्तावित योजनाओं में 17 लाख से अधिक उपग्रहों और अंतरिक्ष दर्पणों को कक्षा में भेजने का लक्ष्य रखा गया है, जो इस सुरक्षित सीमा से 17 गुना अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार यह चिंता मई 2019 में तब शुरू हुई, जब स्पेसएक्स ने अपनी स्टारलिंक इंटरनेट सेवा के पहले उपग्रह प्रक्षेपित किए। लंबे एक्सपोजर में ली जाने वाली खगोलीय तस्वीरों पर इनकी चमकीली लकीरें दिखाई देने लगीं। उस समय पृथ्वी की कक्षा में लगभग 2,000 सक्रिय उपग्रह थे, जबकि अब उनकी संख्या 14,000 से अधिक हो चुकी है। निष्क्रिय उपग्रहों और अंतरिक्ष मलबे को मिलाकर यह आंकड़ा लगभग 32,000 तक पहुंच जाता है। इसके साथ ही भविष्य के लिए 17 लाख से अधिक उपग्रहों और अंतरिक्ष दर्पणों की प्रस्तावित परियोजनाएं सामने आ चुकी हैं। रिपोर्ट के अनुसार ईएसओ के खगोलशास्त्री ओलिवियर हैनो ने पिछले 30 वर्षों के अनुभव और कंप्यूटर सिमुलेशन के आधार पर प्रस्तावित उपग्रहों के प्रभाव का आकलन किया है। उनका मानना है कि यदि उपग्रह सामान्य आंखों से दिखाई न देने जितने मंद भी हों, तब भी उनकी संख्या लगभग 1 लाख से अधिक होने पर वेधशालाओं को होने वाला नुकसान मौसम या उपकरणों की खराबी से होने वाले सामान्य नुकसान के बराबर या उससे अधिक हो जाएगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यह कोई कठोर सीमा नहीं है। यदि संख्या 50,000 के आसपास रहे तो स्थिति और बेहतर होगी। अध्ययन में स्पेसएक्स की उस प्रस्तावित योजना का भी विश्लेषण किया गया है, जिसमें भविष्य में कक्षा में डाटा सेंटर विकसित करने के उद्देश्य से लगभग 10 लाख अतिरिक्त उपग्रह भेजने का प्रस्ताव रखा गया है। सिमुलेशन के अनुसार यदि यह योजना पूरी होती है तो चिली स्थित ईएसओ की वेरी लार्ज टेलीस्कोप से अंधेरा होने के दो घंटे बाद ली गई एक तस्वीर में दर्जनों उपग्रहों की लकीरें दिखाई देंगी और तस्वीर का लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा अनुपयोगी हो सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसी स्थिति में उपग्रह वैज्ञानिक आंकड़ों के नुकसान का सबसे बड़ा कारण बन जाएंगे। सही बात तो यह है कि इंसान शोध और अनुसंधान तो कर रहा है, करना भी चाहिए। इसके लिए जो परियोजनाएं बनाई जाती हैं, उनकी कोई सीमा नहीं होती। हर कोई उस क्षेत्र में घुसना चाहता है। और कई क्षेत्रों में तो अंधी दौड़ शुरू हो जाती है। जैसे अभी एआई को लेकर हो रहा है। लोग बेतहाशा इसके पीछे भाग रहे हैं। अब डेटा सेंटर खोलने की प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है। और इसके चक्कर में हम उन सावधानियों और चेतावनियों को नजरअंदाज करने लगे हैं, जो आगे चलकर हमारे लिए ही खतरनाक साबित हो सकती हैं। यही हाल अंतरिक्ष को लेकर हो रहा है। विभिन्न देशों के साथ ही अब स्पेसएक्स भी उपग्रह भेजने की स्पर्धा में शामिल हो गया है। अभी इसमें प्रतिभागियों की संख्या और बढऩी है। हर देश और कंपनी अध्ययन के लिए लगातार उपग्रह भेजने की रफ्तार बढ़ाएंगे, यह भी तय है। वैज्ञानिक इससे होने वाले खतरे से अभी से आगाह कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल तो कोई सुनने को तैयार नहीं दिखता। होड़ लगी है। वैज्ञानिक कह रहे हैं कि हमारे उपग्रह ऊपर जाकर वहां भी असंतुलन पैदा करेंगे, भले ही वह मामूली है। लेकिन वह मामूली असंतुलन पृथ्वी के लिए बड़ा और खतरनाक भी हो सकता है। बहुत पुरानी घटना थी, स्काईलैब वाली। यह उपग्रह पृथ्वी पर गिरना था, उसके खतरे से पूरी दुनिया में तहलका मच गया था। हालांकि फिर वह समुद्र में गिर गया ओर बहुत नुकसान नहीं हुआ, लेकिन तमाम देशों के बड़े हिस्सों में घबराहट तो फैल ही गई थी। अब तो उपग्रहों की बाढ़ सी आ रही है। वैज्ञानिक जिस अंधकार के कम होने की चिंता कर रहे हैं, वह हमारी पृथ्वी के जीवन पर बड़ा प्रभाव डालेगी। देखना होगा कि इस अध्ययन, चिंता और चेतावनी को कितनी गंभीरता से लिया जाता है।
वैज्ञानिकों की चेतावनी-संजय सक्सेना
Follow Us
