मनुष्य एवं मनुष्यता-डॉ.माणिक विश्वकर्मा

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जीवन में दिखावे की संस्कृति, स्वार्थलोलुपता एवं संवेदनहीनता बढऩे के कारण मनुष्य धीरे-धीरे मनुष्यता खोता जा रहा है। परिणामस्वरूप मानवीय मूल्यों में गिरावट आने लगी है हालांकि दुनियाभर में इसके संरक्षण के लिए अनेक प्रयास किए जा चुके हैं फिर भी ये भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। मनुष्यता का मतलब होता है इंसानियत, दया, करुणा, परोपकार और उदारता जैसे मानवीय गुणों से संपृक्त होना। शुभ कर्म करने एवं श्रेष्ठ आचरण रखने वाला मनुष्य ही श्रेष्ठ मनुष्य कहलाता है। ऋग्वेद में कहा गया है कि मनुष्य की परीक्षा कर्म से होती है। कर्म न करनेवाला मनुष्य दस्यु के समान होता है। मशहूर शायर चकबस्त बृज नारायण ने कहा है कि दर्द-ए- दिल पास- ए- वफ़ा जज़्बा-ए-ईमाँ होना, आदमियत है यही और यही इंसाँ होना यानी कि दूसरों के दु:ख-दर्द को समझना, अपनी वफ़ादारी और वादों को निभाना, तथा ईमानदारी एवं विश्वास की भावना रखना ही असल इंसानियत और इंसान होने की पहचान है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘मनुष्यताÓ के द्वारा समाज को आदर्श जीवन जीने का संदेश दिया था। मनुष्यता की पहचान रूप-रंग या भौतिक सुविधाओं से नहीं होती बल्कि नि:स्वार्थ भावना, मानवीय एकता, सद्भाव, सहानुभूति, क्षमा, सहिष्णुता, परोपकार, त्याग, बलिदान, उदारता, समता, विश्व बंधुत्व, भाईचारा जैसे गुणों से की जाती है। सच्चा मनुष्य वही माना जाता है जिसके भीतर क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार नहीं होता। ईमानदारी, सच्चाई और नैतिक मूल्यों का अनुपालन करना मनुष्यता की नींव मानी जाती है। भर्तृहरि ने लिखा हे कि येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्म:। ते मत्र्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरुपेण मृगाश्चरन्ति। अर्थात जिन मनुष्यों में न विद्या है, न तप है, न दान देने की भावना है, न ज्ञान है, न शील है, न ही जीवन में कोई उत्तम गुण है और न धर्म है, वे पृथ्वी पर भाररूप पशु ही हैं, जो मनुष्य के रूप में विचरण करते हैं। जब सृष्टि का निर्माण हुआ उस वक्त कोई विघटन नहीं था मानव ने ही उसे विभिन्न जाति, धर्म, संप्रदाय एवं राष्ट्र में बांट दिया। जैन संत सुनील मुनि, वीरेंद्र मुनि अर्हम मुनि ने मानवता को ही मनुष्यता की सच्ची परिभाषा है। गीता में कहा गया है कि मनुष्य न देह है, न नाम है, बल्कि आत्मा है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने मनुष्य को परिभाषित करते हुए लिखा है कि मनुष्य वो है जो मननशील होकर दूसरों के सुख-दु:ख और हानि-लाभ को समझे कहा गया है कि शीलं परं भूषणम् यानी शील मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है। शील से रहित मनुष्य तो पशु सदृश माना जाता है। आचार्य चाणक्य ने कहा है कि यथा चतुर्भि: कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनै:। तथा चतुर्भि: पुरुष: परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा।। अर्थात जिस तरह सोने की परख उसे घिसकर काटकर, तपाकर और पीटकर की जाती है उसी तरह मनुष्य की पहचान उसके त्याग, शील (सदाचार), गुण और कर्म से होती है। मनुष्यता तब तक मर नहीं सकती जबतक दुनिया में परोपकार की भावना जीवित रहेगी। दरअसल मनुष्य एक शारीरिक जैविक पहचान है जबकि मनुष्यता नैतिक, मानवीय एवं चारित्रिक गुणों को दर्शाती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो मनुष्य होना यदि जैविक स्थिति है तो मनुष्यता उसकी नैतिक उपलब्धि कहलाती है। यह सच है कि भागदौड़ भरी जि़ंदगी में मनुष्य के पास अन्य कामों के लिए समय की कमी पड़ जाती है लेकिन परोपकार एवं सामाजिक कल्याण को यदि हम अपना नैतिक कर्तव्य एवं दैनिक जीवन का हिस्सा मान लें तो कोई भी सत्कर्म करना आसान हो जाएगा । सारे वेदों का यही सार है कि परोपकार से बड़ा पुण्य नहीं और पर पीड़ा से से बड़ा पाप नहीं। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने विवेक और ज्ञान का प्रयोग करते हुए मनुष्यता के गुणों का पालन करें क्योंकि कहा गया है कि आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम्। ज्ञानं हि तेषामधिको विशेषो ज्ञानेन हीना: पशुभि: समाना:। अर्थात आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये वृत्तियाँ तो मनुष्य और पशु दोनों में समान होती हैं। मनुष्य में केवल विवेक और ज्ञान ही विशेष होता है, इसलिए ज्ञान विहीन मनुष्य पशु के समान आचरण करने लगता है। चाणक्य नीति में कहा है कि- गुणैरुत्तुंगतां याति नोच्चैरासनसंस्थित: प्रासादशिखरस्थोऽपि काक: किं गरुडायते। अर्थात व्यक्ति केवल किसी ऊँचे स्थान पर बैठने या ऊँचा पद प्राप्त करने से महान नहीं बनता। महानता हमेशा उसके सद्गुणों और कर्मों से आती है। जैसे कौआ यदि किसी ऊँचे महल की छत पर बैठ जाए तो वह पक्षियों के राजा गरुड़ नहीं बन जाता।