बेरहम नहीं बेहतरीन हो जीवन शैली-विजय मिश्रा

Follow Us

‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान। सूरज ना बदला,चांद ना बदला,ना बदला रे आसमान, कितना बदल गया इंसानÓ। वर्ष 1958 मे रीलिज फिल्म नास्तिक के इस चर्चित गीत को प्रदीप कुमार ने लिखा था। छ: दशक पूर्व लिखा गिया यह गीत अब कभी कभी ही सुनाई देता है, किंतु इसके एक-एक शब्द आज के इंसान के बदलते स्वरूप को चित्रित करते हैं। इंसान के स्वभाव में प्रतिदिन रेत के घरौंदे की तरह गिरावट आ रही है। नख से सिर तक इंसान में आते बदलाहट को पशु- पक्षी भी समझने लगे हैं, फलस्वरूप इंसान -पशु- पक्षियों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही है।अनेक जीव जंतुओं के वंश संकट में है। लुप्त होने की कगार पर हैं। इंसानों के स्वभाव में क्रूर जानवरों की तरह निष्ठुरता, बर्बरता और विवेकहीनता जैसे अनेक अवगुण सहज ही परिलक्षित हो रहें हैं। यह बात तो सर्वविदित है कि शारीरिक संरचना सहित स्वभाव, खान-पान और रहन-सहन जैसे अनेक मामलों में इंसान की पहचान जानवरों से अलग होती है। तभी तो ईमानदारी, दयालूता,दानशीलता जैसे तमाम अच्छे गुणों की खान इंसान स्वयं को ही मानता आ रहा है,हालांकि जीव जगत में कुत्ता ही एकमात्र ऐसा भाग्यशाली जानवर है, जिसे इंसान ने स्वंय से कहीं अधिक वफादार होने का तमगा दे रखा है, किंतु बेचारे कुत्ते का भीषण दुर्भाग्य है कि बेहद गंदी गाली के रुप में भी ‘कुत्ताÓ शब्द इस्तेमाल होता है। युग परिवर्तन के साथ साथ इंसानों की जीवन शैली में आए बदलाव ने उसकी जीवन शैली को बेहतरीन के बजाय बेरहम बना दिया है। सृष्टि में अब इंसानियत नाम मात्र को शेष है। अपने हित के लिए किसी अन्य जीव जंतु पेड़ पौधे को बेरहमी से काटने के मामले में प्राणी जगत में अव्वल होने का रिकॉर्ड इंसान के नाम दर्ज है। ऐसे घोर चिंताजनक दौर में एक समाचार पढऩे को मिला कि सूअर का लिवर और किडनी इंसान के भीतर प्रत्यारोपित करने में चीन के चिकित्सकों को सफलता मिली है। चीनी चिकित्सकों ने सूअर के लिवर और दोनों किडनी को एक त्रिपन वर्षीय मेंटली डेड इंसान के शरीर में प्रत्यारोपित करके उसके शरीर की कार्य प्रणाली को पांच दिनों तक सामान्य बनाए रखा।इससे यह बात सामने आई कि जेनेटिक रूप से संशोधित सूअर के अंग मानव शरीर में स्थापित हो सकते हैं और कार्य करने में सक्षम हैं। इस नई उम्मीद को जगाने वाले चीनी चिकित्सकों से कहीं ज्यादा उस सूअर को बाअदब सेल्यूट है। जिसने स्वार्थी मनुष्य के जीवन को बचाने के लिए महर्षि दधीचि की भांति नि:शुल्क नि:स्वार्थ अंगदान करके अभूतपूर्व इतिहास रच दिया है। सोचने लायक बात यह भी है कि सृष्टि के जीवजगत में सर्वश्रेष्ठ कहलाने वाला इंसान देहदान -अंगदान के मामले में खुद पीछे रहता है। इसीलिए समूची दुनिया में मानव अंगों की कमी लंबे समय से चिकित्सा जगत के लिए चुनौती बनी हुई है। आज भी किडनी- लिवर और अन्य अंगों के प्रत्यारोपण हेतु अंगदान की प्रतीक्षा में अनेक लोग औषधीय और चिकित्सा मशीनों के बूते जीवित हैं। जिंदा लाश की तरह जीवन जीते ऐसे हताश निराश लोगों की जिंदगी में चीनी चिकित्सकों की यह अविश्वसनीय तकनीकी और सूअर शरीर ने उम्मीद की नई किरण जगा दी है। जगजाहिर है कि इंसान और सूअर की उत्पत्ति सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही हुई होगी।अपने फायदे के लिए चतुर इंसान ने सुअर पालन, सूअर बाल, सूअर का मांस का व्यवसाय समूचे विश्व में फैला रखा है, लेकिन मानव शरीर में सूअर के बहुअंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में चीनी चिकित्सकों को मिली सफलता ने चमत्कार कर दिया है।मानव अंगों की कमी को दूर करने की दिशा में एक नव व्यवसाय का द्वार खोल दिया है। चिकित्सा विज्ञान के इस चमत्कार के साथ यह भी आस बंधी है कि गधे, सूअर, उल्लू, बंदर, गिरगिट, छिपकली, चूहा जैसे जीवों के नाम को गंदी गाली के रूप में इस्तेमाल करने वाला इंसान शायद जीव हत्या से दूर मुक पशु प्रेम के प्रति प्रेरित होगा। दया भाव की भावना विकसित होगी। एक नए पवित्र शब्द ‘सूअरियतÓ का चलन बढ़ सकता है और कहना पड़ेगा कि अब इंसानियत की जगह सुअरियत की कीमत बढ़ गई है। चिकित्सकों के इस अनूठे प्रयास को इंसान के लिए तो हितकारी कहा जा सकता है, किन्तु बेचारा चौपाया सूअर के लिए तो यह अनिष्टकारी ही है। इस खबर से सूअर कौम भयभीत है और मानव समाज उत्साहित है। सूअर और मनुष्य की सोच में यही अंतर है।