इस बार जून में रखा जाएगा वट पूर्णिमा व्रत, जानें वजह

Follow Us

भारतीय संस्कृति में पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए महिलाओं का समर्पण किसी से छिपा नहीं है। यमराज के पाश से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस छीन लाने वाली सती सावित्री (Savitri Vrat) की याद में मनाया जाने वाला वट पूर्णिमा व्रत (Vat Purnima 2026) इस साल अपनी तारीखों को लेकर महिलाओं के बीच भारी कौतूहल जगा रहा है। अगर आप भी इस असमंजस में हैं कि यह महाव्रत मई में है या जून में, तो हम आपकी यह उलझन दूर कर देते हैं।

ज्योतिषाचार्या नीतिका शर्मा के अनुसार इस साल ज्येष्ठ पूर्णिमा पर आधारित यह पावन व्रत 29 जून 2026 को रखा जाएगा, जबकि अमावस्या आधारित वट सावित्री व्रत 16 मई को संपन्न हो चुका है।

  • वट पूर्णिमा 2026 कब है (Vat Purnima 2026 Date)

पंचांग के हिसाब से वट पूर्णिमा व्रत (Vat Purnima 2026) इस बार 29 जून 2026 को है, 30 मई को नहीं। असल में 30 मई को ज्येष्ठ अधिक मास की पूर्णिमा पड़ रही है। इस साल ज्येष्ठ महीने के बीच में ही अधिक मास आ गया, इसी वजह से वट पूर्णिमा का व्रत आगे बढ़ गया है। अधिक मास 17 मई से 15 जून तक रहेगा।

  • वट सावित्री और वट पूर्णिमा में क्या अंतर है?

अक्सर लोग वट सावित्री और वट पूर्णिमा (Vat Purnima 2026) को लेकर भ्रमित हो जाते हैं। दरअसल, उत्तर भारत (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश) में ज्येष्ठ अमावस्या को यह व्रत रखने की परंपरा है। वहीं, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के राज्यों में इसे ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। दोनों ही व्रतों का मूल उद्देश्य एक ही है पति की दीर्घायु और खुशहाल दांपत्य जीवन।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बरगद (वट) के पेड़ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों का वास होता है। इस पेड़ की लंबी आयु की तरह ही पति की उम्र भी लंबी हो, इसी कामना के साथ महिलाएं इसकी पूजा करती हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी बरगद का वृक्ष पर्यावरण संरक्षण और छायादार गुणों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

  • वट पूर्णिमा 2026 शुभ मुहूर्त

ज्योतिषविदों के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 29 जून 2026 को सुबह 03:06 बजे होगी और इसका समापन 30 जून को सुबह 05:26 बजे होगा। उदयातिथि के अनुसार 29 जून को ही व्रत रखना सर्वश्रेष्ठ है। इस दिन सौभाग्य की कामना के लिए निम्नलिखित मुहूर्त अमृत समान फल देने वाले हैं:

  • वट पूर्णिमा पूजा विधि

वट पूर्णिमा के दिन महिलाएं सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करती हैं और नए वस्त्र पहनकर ‘सोलह श्रृंगार’ करती हैं। इसके बाद हाथ में गंगाजल लेकर व्रत का संकल्प लिया जाता है।

  • बांस की टोकरी का महत्व:

शाम के समय सुहागिनें बांस की टोकरी में पूजा सामग्री (धूप, दीप, फल, भीगे चने और मिठाई) लेकर वट वृक्ष के पास जुटती हैं।

  • पेड़ को हवा देने की अनोखा रस्म:

सबसे पहले बरगद की जड़ों में जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद हाथ के पंखे (बीजना) से वट वृक्ष को धीरे-धीरे हवा दी जाती है—यह वही रस्म है जो सती सावित्री ने सत्यवान के प्राण लौटते समय की थी।

  • सात फेरे और रक्षासूत्र:

महिलाएं वट वृक्ष की परिक्रमा करते हुए उसके तने पर कच्चे सूत का धागा सात बार लपेटती हैं और सुखद भविष्य की प्रार्थना करती हैं।

  • कथा श्रवण और पारण:

पेड़ के नीचे बैठकर ही सत्यवान-सावित्री की अमर कथा सुनी जाती है। घर लौटकर महिलाएं अपने पति के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेती हैं और उन्हें भी पंखे से हवा करती हैं। इसके बाद पूजा में चढ़े फल और मीठे भोजन के साथ व्रत का पारण किया जाता है।