जयपुर। राजस्थान में गहराते सूखे और अकाल के संकट को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रदेश की मौजूदा भजनलाल सरकार पर तीखा प्रहार किया है। रविवार को जैसलमेर दौरे पर रवाना होने से पहले जयपुर स्थित अपने निवास पर मीडिया से मुखातिब होते हुए गहलोत ने आरोप लगाया कि प्रदेश में इस बार अकाल और सूखे की स्थिति गंभीर बन चुकी है, लेकिन सरकार को धरातल पर गांवों में बने इस भयावह संकट का अहसास तक नहीं है। उन्होंने चेताया कि यदि मुख्यमंत्री स्तर पर तत्काल सख्त मॉनिटरिंग और ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में समूचे प्रदेश को भीषण मानवीय और आर्थिक त्रासदी से जूझना पड़ेगा।
पूर्व मुख्यमंत्री ने अन्य राज्यों की कार्यप्रणाली का उदाहरण देते हुए कहा कि सूखे और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भाजपा शासित अन्य राज्यों तक में मुख्यमंत्रियों ने ग्राउंड जीरो पर दौरे शुरू कर दिए हैं और राज्य स्तर पर निरंतर निगरानी की जा रही है। इसके विपरीत, राजस्थान देश का एकमात्र ऐसा राज्य नजर आ रहा है जहां सरकार स्थिति की गंभीरता से पूरी तरह अनजान बनी हुई है। गहलोत ने कहा कि हाल ही में उन्होंने बीकानेर का दौरा किया था, जहां हालात बेहद गंभीर हैं। इसके अलावा जैसलमेर, बाड़मेर और जोधपुर जैसे सीमावर्ती व पश्चिमी जिलों में सूखे का प्रकोप चरम पर पहुंच चुका है।
गहलोत ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुधन पर मंडरा रहे खतरे को रेखांकित करते हुए कहा कि चारे और पानी के अभाव में पशुधन दम तोड़ने लगा है। जैसलमेर में स्थानीय स्तर पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि चारे-पानी की किल्लत से हजारों गायें काल का ग्रास बन चुकी हैं।
बाजार में चारे के दाम ₹20 प्रति किलो के चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुके हैं और सरकार की तरफ से चारे का कोई समुचित प्रबंधन नहीं दिख रहा।
उन्होंने जल संकट पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि पूरे उत्तर भारत और खासकर राजस्थान में बांध खाली पड़े हैं। सरकार के पास पानी के स्तर से जुड़े सारे आंकड़े उपलब्ध हैं, लेकिन इसके बावजूद आगामी पेयजल और सिंचाई संकट से निपटने के लिए कोई दूरगामी कार्ययोजना जमीन पर दिखाई नहीं दे रही। उन्होंने कहा कि केवल बयानबाजी और लंबी-चौड़ी बातों से अकाल नहीं मिटता, इसके लिए युद्धस्तर पर काम करना पड़ता है।
अपने पूर्ववर्ती कार्यकालों के अकाल प्रबंधन का स्मरण कराते हुए गहलोत ने कहा कि अकाल के दौरान त्वरित राहत कार्य शुरू करना किसी भी प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि गोवंश के लिए कैंप खोलने पड़ते हैं, चारे-पानी का बड़े पैमाने पर परिवहन करना पड़ता है और ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराना होता है। उन्होंने बताया कि उनके शासनकाल में 16 अगस्त से ही अकाल राहत कार्य शुरू कर 10 से 11 महीने तक लगातार चलाए गए थे, जिसे ग्रामीण आज भी याद करते हैं।
‘डबल इंजन’ सरकार पर तंज कसते हुए गहलोत ने कहा कि जब केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही दल की सरकार है, तो मुख्यमंत्री केंद्र से विशेष आर्थिक पैकेज और मदद क्यों नहीं मांग रहे? उन्होंने याद दिलाया कि अपने पहले कार्यकाल में केंद्र में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार होने के बावजूद वे केंद्र से तालमेल बिठाकर भरपूर इमदाद लाए थे और ‘काम के बदले अनाज’ जैसी ऐतिहासिक योजना को लागू कर अकाल का सफल प्रबंधन किया था। उन्होंने मांग की कि सरकार तत्काल विशेष गिरदावरी पूरी करवाकर प्रभावित क्षेत्रों में औपचारिक अकाल राहत कार्य, चारा डिपो और पशु शिविर शुरू करे।
