नई दिल्ली। गुरनूर बराड़ का चयन हाल ही में अफगानिस्तान के खिलाफ टेस्ट मैच के लिए भारतीय टीम में हुआ था। 26 साल के तेज गेंदबाज को डेब्यू का मौका तो नहीं मिला, लेकिन इस बीच उनके क्रिकेटर बनने की कहानी सबके सामने आई।

6 फीट 5 इंच के लंबे कद के तेज गेंदबाज ने 17 साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू किया और 9 साल की कड़ी तपस्या के बाद वो भारतीय टीम में चुने गए। गुरनूर के पिता सुखबीर सिंह बराड़ ने बताया कि जब उन्हें पता चला कि बेटा क्रिकेट को लेकर जुनूनी है तो वो दो कारणों से बेहद खुश हुए।
सुखबीर ने बताया कि पहली बात तो वो बेटे के सपने का समर्थन करने वाले पिता बनना चाहते थे और दूसरा कि बेटा बुरी संगत से दूर रहेगा। सुखबीर सिंह बराड़ पंजाब पुलिस में एएसआई पद पर कार्यरत हैं।
‘बुरी संगत से बचा बेटा’
सुखबीर ने पीटीआई को दिए इंटरव्यू में कहा, ‘जब वो किशोरावस्था में पहुंचा तो मैं चाहता था कि वो पढ़ाई के साथ-साथ खेल में जुट जाए ताकि उसके पास किसी अन्य चीज में शामिल होने का समय नहीं बचे। सही कोचिंग का मतलब है कि आप किसी बुरी संगत से बचे। जब गुरनूर ने रवि सर की निगरानी में चैंप्स एकेडमी ज्वाइन की तो फिर उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।’
बेटे के उज्ज्वल भविष्य की कामना
गुरनूर ने 11वीं क्लास में क्रिकेट खेलना शुरू किया। 26 की उम्र में वो भारत की टेस्ट और वनडे टीम का हिस्सा बने। हालांकि, उन्हें अपने डेब्यू का इंतजार है। पिता को अपने बेटे के उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद है।
6 फीट 4 इंच कद के सुखबीर ने कहा, ‘जब हमें बेटे के भारतीय टीम में चयन की खबर मिली तो भले ही मैं पुलिसवाला हूं, लेकिन गुरनूर की मां (मानविंदर) से ज्यादा भावुक हुआ। मेरी आंखें गीली थीं।’ सुखबीर बराड़ ने 1995 राष्ट्रीय बास्केटबॉल चैंपियनशिप में पंजाब का प्रतिनिधित्व किया था।
सेलेक्शन की अनोखी कहानी
सुखबीर ने बताया, ‘जिस दिन अफगानिस्तान के खिलाफ टेस्ट स्क्वाड की घोषणा हुई, तब हम परिवार में गमी के कारण अपने पैतृक घर मुख्तसर साहिब में थे। गुरनूर की जब आईपीएल के दौरान शाम की प्रैक्टिस होती थी तो वो दिन में सोने चला जाता और अपनी मां को कहता कि शाम 4:45 के करीब उठा दें।’
‘तो मेरी पत्नी ने बेटे को उठाया और पूछा कि आज टीम की घोषणा नहीं हुई क्या? गुरनूर ने जवाब दिया, ‘हां मां, मैं सेलेक्ट हो गया हूं और उसने फोन रख दिया। मेरा बेटा ऐसा ही है। वो किसी चीज को लेकर ज्यादा उत्सुक नहीं होता। अपने काम से काम रखने वाला लड़का है।’
बास्केटबॉल रास नहीं आया
सुखबीर ने याद किया कि गुरनूर को बास्केटबॉल खेलने को भेजा, लेकिन उसे वहां मजा नहीं आया। उन्होंने कहा, ‘पुलिस वाला होने के कारण मुझे अपने बच्चों को बड़ा होते देखने का समय कम ही मिला। गुरनूर ने जब 10वीं पूरी की तब मैंने उसे बास्केटबॉल खेलने भेजा। बेटे ने दो-तीन सप्ताह बाद कहा कि पापा मुझे मजा नहीं आ रहा है।’
बेटे के फैसले पर गर्व
सुखबीर सिंह ने बताया कि बेटा क्रिकेट के साथ-साथ पढ़ाई में भी अच्छा था। उसे डीएवी कॉलेज में स्पोर्ट्स कोटे से एडमिशन मिला। उसने डीएवी कॉलेज को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई और दुबई में इंटरनेशनल कॉलेज टूर्नामेंट के लिए उसका चयन हुआ।
पिता ने बताया, ‘उस समय मोहाली जिला एसोसिएशन ने कटोच शील्ड (पंजाब की सबसे बड़ा अंतर-जिला टूर्नामेंट) के लिए गुरनूर को चुना। गुरनूर ने दुबई जाने के बजाय कटोच ट्रॉफी खेलने का फैसला किया। मेरे ख्याल से उसने अच्छा फैसला किया।’
कैसे खरीदी पहली कार
सुखबीर ने गुरनूर की पहली कार खरीदने का किस्सा भी साझा किया। उन्होंने कहा, ‘जब पंजाब किंग्स ने पहली बार 20 लाख रुपये में गुरनूर को खरीदा तो उसने पूछा ‘पापा मैं कार खरीद सकता हूं? मैंने जवाब दिया, ‘ये तुम्हारी कमाई है। तुम कार खरीदने के लिए स्वतंत्र हो। इस तरह उसने पहली कार खरीदी।’
