महंगाई की बढ़ती दर – संजय सक्सेना

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बजट के बाद आम तौर पर बाजार में महंगाई कम होने की उम्मीद की जाती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुुआ। बाजार ऊपर जाते दिखाई दे रहा है। कहने को कुछ सब्जियों की कीमतें गिरती दिख रही हैं, लेकिन अन्य तमाम वस्तुओं के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। बाजार की समीक्षा के दौरान जो रिपोर्ट आई है, उसमें कहा गया है कि वस्तुओं के थोक मूल्य पर आधारित महंगाई की दर में बढ़ोतरी हो गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार बीते जनवरी महीने के दौरान थोक महंगाई की दर बढकऱ 1.81 प्रतिशत हो गई है। यह पिछले नौ महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। दिसंबर में यह दर 0.83 प्रतिशत थी। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से धातु, अन्य तैयार माल, गैर-खाद्य वस्तुएं, खाद्य वस्तुएं और कपड़ा जैसे उत्पादों की कीमतों में वृद्धि के कारण हुई है। बीते जनवरी में खाद्य महंगाई भी बढ़ी है। इस महीने यह 1.41 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जबकि पिछले साल दिसंबर में यह 0.00 प्रतिशत यानी स्थिर थी। अर्थशास्त्रियों का अनुमान था कि थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई थोड़ी और बढकऱ 1.25 प्रतिशत हो जाएगी। यह अनुमान दिसंबर के 0.83 प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा था। भारत की खुदरा महंगाई भी जनवरी 2026 में बढ़ी है। यह अब 2.75 प्रतिशत हो गई है। यह बढ़ोतरी भी खाद्य पदार्थों और कीमती धातुओं की कीमतों में इजाफे की वजह से हुई है। यह नए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के पहले आंकड़े हैं, जिसका आधार वर्ष 2024 है। ग्रामीण इलाकों में महंगाई 2.73 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 2.77 प्रतिशत रही। एक बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, तीन प्रमुख सब्जियों के दाम गिरे हैं या बढ़े नहीं हैं, इनमें आलू, प्याज और टमाटर शामिल हैं। सोना-चांदी में जबर्दस्त उतार-चढ़ाव ने आंकड़ों के विश्लेषण को भी प्रभावित किया है। जनवरी के आंकड़ों में जो थोड़ी बहुत अस्थिरता देखी गई, वह मुख्य रूप से सोने की कीमतों से प्रेरित थी, लेकिन कम वेटेज के कारण इसका कुल प्रभाव सीमित रहा।बैंक ऑफ बड़ौदा का इन-हाउस ट्रैकर फरवरी 2026 के पहले 11 दिनों के लिए साल-दर-साल आधार पर -0.4 प्रतिशत चल रहा है, जो कीमतों में नरमी का संकेत है। हालांकि, रिपोर्ट में कुछ चिंताओं को भी रेखांकित किया गया है जिन पर नजर रखने की जरूरत है, खाद्य तेल और दालें, जैसे मूंगफली, सूरजमुखी और सोयाबीन जैसे खाद्य तेलों और अरहर व उड़द जैसी दालों को छोडकऱ, उच्च आवृत्ति वाले खाद्य मूल्यों में कोई तत्काल जोखिम नहीं है। हां, रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि कीमती धातुओं की कीमतें कोर इन्फ्लेशन के लिए एक अपसाइड रिस्क पैदा कर सकती हैं, इसलिए इसकी निगरानी जरूरी है। कुल मिलाकर आंकड़ों में महंगाई थोड़ी बढ़ती दिख रही है, कुछ वस्तुओं की कीमतों में गिरावट आई है, लेकिन दैनिक उपयोग की अधिकांश चीजों के दामों में वृद्धि का सिलसिला ही जारी है। कंपनियों ने दाम बढ़ान का नया फार्मूला निकाल लिया है, इसके तहत पैकेजिंग में वजन कम कर दिया जाता है और दाम वही रहते हैं। उपभोक्ता को इसमें कोई राहत नहीं मिलती। गेहूं बाजार में भले ही सस्ता दिखता हो, लेकिन हर बार आटा तो महंगा ही होता जा रहा है। अब जो मिलेट्स का दौर चल रहा है, तो उसमें भी महंगाई का तडक़ा लग रहा है। मक्का सबसे ज्यादा तेजी से चढ़ती है। ज्वार और रागी के दाम भी चढ़ रहे हैं। सामान्य सब्जियां यदि सस्ती दिख रही हैं तो आर्गेनिक के दाम काफी ऊंचे हैं। कुछ सब्जियां आज भी पाव के हिसाब से बिकती हैं, जबकि सरकार कहती है कि महंगाई नियंत्रण में है। कागजी मूल्यों और बाजार के दामों में काफी फर्क दिखाई देता है। जो कंपनियां सीधे डिलीवरी करती हैं, उनके यहां दाम कम रहते हैं। लेकिन माल या बड़े स्टोर से खरीदने में कोई खास किफायत नहीं दिखती है। एक तो जरूरत से ज्यादा सामान ले लिया जाता है, दूसरे एक चीज सस्ती कर देते हैं, दूसरी में संतुलन बना लेते हैं। यह बात किसी सरकार स्तर पर नहीं पहुंचती, या इसे किसी सरकारी सर्वेक्षण में शामिल नहीं किया जाता। बजट को भले ही लोक लुभावन होने का दावा किया जाता है, लेकिन बाजार पर कोई बहुत असर पड़ता नहीं है। उलटा ही होता है। सामान्य वर्ग पर भार बढ़ता ही जाता है। बीपीएल को तो तमाम सरकारी योजनाओं का फायदा मिल जाता है, लेकिन मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग को कहीं राहत नहीं मिलती। उसका बजट बढ़ता जा रहा है, आय सिमटती दिख रही है। स्तर बनाए रखने के चक्कर में कर्ज के बोझ में आदमी दबता चला जा रहा है।