नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व की पिच पर वोटरों को साधने की मुहिम का शोर ज्यादा है, पर राज्य में अहम मुस्लिम वोटरों को लुभाने का काम खामोशी से हो रहा है। समाजवादी पार्टी तो इस पर खास सतर्कता बरत रही है। बिना शोर शराबे के वह इन्हें अपने पाले में करने की जुगत में है। मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर भाजपा के बढ़ते जीत के सिलसिले ने उसे चौकन्ना कर रखा है। ऐसे में सॉफ्ट हिंदुत्व के सांकेतिक कदमों, पीडीए की राजनीति और अल्पसंख्यकों के भरोसे के बीच संतुलन साधना उनके लिए आसान नहीं होगा। 2027 के विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट के साथ ही मुस्लिम बहुल सीटों पर सियासी रणनीति का सवाल फिर केंद्र में है।
भाजपा की दावेदारी से इंडिया गठबंधन चौकन्ना:
एआईएमआईएम व आजाद समाज पार्टी- कांशीराम से ज्यादा तगड़ी चुनौती उसे भाजपा से मिलेगी जो विधानसभा उपचुनाव में कुंदरकी, रामपुर जैसी कई सीटों पर जीत दर्ज कर चुकी है। 2017 में तो उसने सहारनपुर की देवबंद सीट जीत कर चौंका दिया था। ऐसे में मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर बन रहा गैर मुसलिम समीकरण साधने में भाजपा व इंडिया गठबंधन दोनों अब नए सिरे से रणनीति बना रहे हैं। अब समाजवादी पार्टी ने हर सीट पर 27 हजार वोट व हर बूथ पर पांच नए वोट बढ़ाने पर काम कर रही है।
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गैर मुस्लिम प्रत्याशी उतारने की रणनीति:
सपा व कांग्रेस को अहसास है कि मिल कर चुनाव लड़ने से दलित मुसलिम वोटों का एकतरफा समर्थन मिल सकता है। गत लोकसभा चुनाव में ऐसा दिखा भी। अब सपा ने हर सीट पर 27 हजार वोट व हर बूथ पर पांच वोट बढ़ाने पर काम कर रही है। सपा इस बार भी अपने प्रत्याशियों में मुस्लिमों को कम से कम टिकट देगी ताकि ध्रुवीकरण का मौका विरोधियों को न मिले। सपा ने लोकसभा चुनाव में केवल चार मुसलमान व पांच यादव को टिकट दिया। सब जीत गए। सपा के सामने अपने परंपरागत मुस्लिम-यादव समीकरण को व्यापक पीडीए (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) गठजोड़ में ढालने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ भाजपा की मजबूत चुनावी मशीनरी का सामना करना है।
छोटे दलों की जोर आजमाइश:
सांसद असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी व चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी कांशीराम मुसलिम व दलित वोटरों में अपना असर बढ़ाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। इनके द्वारा उतारे गए प्रत्याशी अगर मजबूती से लड़े मुस्लिम वोटों के बंटवारे में किसको फायदा होगा इसको लेकर सबको उत्सुकता है। बसपा नए सिरे से अपने संगठन को मजबूती देने में जुटी है, लेकिन पार्टी का मुस्लिमों में पैठ पहले जैसी नहीं दिखती है। इन दलों द्वारा सपा पर मुस्लिम हितों की अनदेखी का आरोप लगाया जा रहा है। वहीं इंडिया गठबंधन में इनकी इंट्री की कोशिश भी कुछ लोगों द्वारा की जा रही है।
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उपचुनावों में भाजपा का दबदबा:
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भाजपा ने 11 सीटे जीतीं। मुरादाबाद की कुंदरकी, रामपुर, गाजियाबाद, अलीगढ़ की खैर, मैनपुरी की करहल, शाहजहांपुर की ददरौल, लखीमपुर खीरी की गोला गोकरणनााथ, लखनऊ की लखनऊ पूर्व, प्रयागराज की फूलपुर, अयोध्या की मिल्कीपुर, अम्बेडकरनगर की कटेहरी, मिर्जापुर की मंझवा सीटें भी भाजपा के हिस्से में आईं। इनमें अच्छी तादाद में मुसलिम वोटर हैं। अपना दल सोनेलाल ने रामपुर की स्वार व मिर्जापुर की छानवे जीती। जबकि विपक्षी दल सपा केवल दो सीटें कानपुर शहर की सीसामऊ, बलरामपुर की गैसड़ी ही जीत पाई। रालोद ने मुजफ्फनगर की खतौली व मीरापुर सपा के साथ रहते हुए जीती थी।
खास बातें:
- उत्तर प्रदेश में 21 प्रतिशत मुसलिम वोटर हैं। वह 145 सीटों पर वह असर डालने की स्थिति में हैं।
- 75 सीटों पर मुसलमान 30 प्रतिशत से ज्यादा हैं।
- सपा और सहयोगियों के 34 मुस्लिम प्रत्याशी विधायक बने थे।
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