यूरोप। ब्रिटेन, आयरलैंड और जर्मनी सहित पूरा यूरोप इस समय प्रवासी-विरोधी प्रदर्शनों की आग में झुलस रहा है। सड़कों पर उतरे स्थानीय लोग बाहरी देशों से आने वाले प्रवासियों और शरणार्थियों के खिलाफ उग्र विरोध जता रहे हैं। कहीं दंगे और आगजनी हो रही है, तो कहीं राजनीतिक दल इस संवेदनशील स्थिति का फायदा उठाकर अपनी रोटियां सेंकने में लगे हैं। इस अशांत माहौल ने बेहतर भविष्य, अच्छी नौकरी और उच्च शिक्षा की तलाश में यूरोप जाने वाले लाखों भारतीयों के ‘यूरोपियन ड्रीम’ पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

स्थानीय नागरिकों का मानना है कि प्रवासियों के लगातार आने से मकानों की भारी किल्लत हो गई है, महंगाई आसमान छू रही है और सीमित संसाधनों व रोजगार के अवसरों पर मुकाबला बहुत कड़ा हो गया है। इसके साथ ही, सोशल मीडिया के जरिए स्थानीय लोगों में यह डर और नफरत फैलाई जा रही है कि प्रवासियों की वजह से उनकी मूल संस्कृति और जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी) बदल रही है। इंटरनेट पर फैलने वाली आधी-अधूरी और भड़काऊ जानकारियां इस आग में घी का काम कर रही हैं।

बेहतर जीवनशैली, साफ हवा और सुरक्षित माहौल की चाह में भारतीय छात्र, कामकाजी पेशेवर और परिवार बड़ी संख्या में यूरोपीय देशों का रुख करते रहे हैं। लेकिन अब आयरलैंड और ब्रिटेन जैसे देशों से भारतीय समुदाय के खिलाफ भी नस्लीय हमलों और विरोध की खबरें सामने आ रही हैं। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि बाहरी लोगों को तुरंत देश से बाहर निकाला जाए। अगर यह नफरत और तनाव इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले समय में भारतीयों के लिए वीजा नीतियां बेहद सख्त हो सकती हैं और वहां रहना पहले जितना सुरक्षित नहीं रह जाएगा।
