संसार में विषय वस्तु और परिस्थितियां बहुत हद तक सामाजिक होती हैं। घर से लेकर बाहर तक कई ऐसी संस्थाएं या संस्थान हैं जो इंसान को सामाजिक सुंदर स्वरूप प्रदान करते हैं। इनमें से प्रमुख रिश्तों की डोरी इंसानों में ही नहीं दिखती है। रिश्तों को बनाना सुंदर से संभाल लेना ही इंसान का सबसे बड़ा कर्तव्य और धर्म है। रिश्ते का कमजोर होकर टूट जाना दुखी देना आया है। प्राचीन होता है इंसान कि सभी के साथ मिलजुल कर जीवन यापन करें, तो कहीं इंसान सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप चरित्र बनाने में व्यस्त होता है। रिश्तों की प्रगाढ़ता को बनाए रखने के लिए माता-पिता, भाई-बहन और मित्रों तथा भी रिश्तेदारों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। आज इस आधुनिकता की दौड़ में जीवन टूट रही है। भागमभाग भरी जिंदगी और इच्छाओं के बहुतायत के कारण मानव आज एक दूसरे के प्रति संदेह भाव और कलह बढ़ा रहे हैं। भावनाओं की कद्र की जगह भौतिक लालसाओं का बोल बाला बढ़ रहा है। अपनी संपन्नता बढ़ाने की होड़ और महत्वाकांक्षा इंसान अपने बढ़ते अहंकार में खोता है। प्रायः हर घर में यही अप्रिय स्थिति बन रही है। सामाजिक भावनाएं इंसानी और दाम्पत्य जीवन में दरारें बढ़ा रही हैं। जिस दिन ऐसी स्थिति आ जाएगी उस दिन जीवन नरक बन जाएगा। संसार में विश्वास का प्रतिशत क्रमशः कम हो रहा है। दुनिया के दो प्रतिशत के बीच रिश्ता बनने का जो सामाजिक नियम है वह नियम के माध्यम से खत्म होता है। नियम के बंधन में बंधे रहना ही एक दुखद सत्य है। दोनों सुखद सामाजिक रूप से एक साथ रहते, जीते, खाते और विचार आदान-प्रदान को बनाए रखने के लिए बाध्य होते हैं, किंतु वर्तमान में … रिश्तों खुद के जुगनू-जुगनू की तरह दूसरे के हिस्से में चले जाते हैं। सोशल रिश्ता एवं आधुनिक व्यवस्था के नाम पर ही संबंध टूटने का कगार बढ़ रहा है जो कि नई नई कुरीतियों का जन्म स्थान बन रहा है। इससे भारतीय संस्कृति को संजोने और संजोए जो धरोहर-कालीन थी इसे इस प्रकार जीवन शैली और पाश्चात्य संस्कृति की अपनाई गई पीढ़ी के जीवन में अलगाव की सुगबुगाहट तेज होती नजर आ रही है। करियर और नौकरी की प्राथमिकता, आर्थिक सुदृढ़ता, विचारों की बात के कारण युवा-युवतियों के रिश्तों को टूटना एक आम बात हो गई है। शादी में देरी से संबंधित आंकड़े मिलना अधिक हो गया है। चिकित्साकों की दृष्टि में दांपत्य सुख में मंदी के सबसे बड़ा और अहम् कारण के रूप में ही सामने आता है। इसके कारण प्रतिभा का लगाना सामने आ रहे हैं। डिजिटल जीवन, सोशल मीडिया, इंटरनेट के बारे के युवा युवतियां असामाजिक हो रहे हैं। वह युवा, प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे की नजर की मर्यादा भूल रहे हैं। यही अलगाव के संकट पैदा कर रहे हैं। बच्चों को एकांतिकता के दिन बढ़ चुके हैं। वे अपनी ही धुन में खोए रहते हैं। शिक्षा देने वाली परिस्थितियां भी कुछ ऐसी ही दिखती हैं। वैसे तो भारत देश फिर भी सभी दूरी पैमानों में इस संकट से बची है और विश्व स्तर पर तीसरी महाशक्ति को रोकने की क्षमता और इसके लक्षण की एक बेहद जरूरत बनी है। बात अपनी है कि मन ही के अनेक समाज से दो पीढ़ियों दूरियां, निर्णय में बिखराव आनी, विचार पूर्व युवक-युवतियों का शिकार होती जा रही हैं। विवाह विच्छेद और कोर्ट कचहरी का प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है। समाजशास्त्री अपनी इस अध्ययन रिपोर्ट में भी यही बताते हैं कि इंसान आज एकाकीपन और मानसिक अशांति का शिकार है। ऐसे दुर्भाग्यजनक मोड़ में संवेदनशीलता और सामंजस्य बनाए रखना ही समझदारी है। यदि समाज को बचना है तो नहीं है, तो विकासवाद का रास्ता है। ऐसी अनेक कुरीतियां जो आज विकास को खतरा पहुंचा रही हैं, उसे अपनी सोच और मन ही के अनेक समाज से दूर रहने की आवश्यकता है। समाज में दो लोगों से ज्यादा सामंतवादी चरित्र देखकर रिश्ते उससे अलग हो जाते हैं कि आपसी लड़ाईयां विभिन्न स्तरों पर उभरती हुई इस बात पर ही निर्भर करती हैं कि हम लोग एक अच्छे भविष्य की ओर बढ़े। कुछ कविताएं और पंक्तियां हमें जीवन के उस मोड़ पर ले जाकर खड़ा कर देती हैं जहां हमें विचारना ही पड़ता है।
रिश्तों की मिठास लाने के लिए ही प्रेम से, बड़े दिल से अपनी राहें आगे बढ़ाएं, यही मुख्य लक्ष्य होना चाहिए।
रिश्तों की बांध में बढ़ती दरार- विजय मिश्रा
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