देश में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण तथा इसके परिणामस्वरूप 13 करोड़ से ऊपर नाम मतदाता सूची से हटाए जाने पर विवाद तथा विपक्ष एवं जेए जी के इस मुद्दे पर लगातार आंदोलन के बीच केंद्रीय चुनाव आयोग ने फॉर्म 6 में जोड़े गए अतिरिक्त बिंदु को हटा दिया है, जिसके तहत विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान हर मतदाता को इस बात का घोषणा पत्र भरना होता था कि पिछले विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम वोटर लिस्ट में मौजूद था उक्त मतदाता सूची में मतदाता केंद्र का नाम तथा मतदाता का क्रमांक संख्या का भी उल्लेख घोषणा पत्र में करना होता था। हालांकि चुनाव आयोग का यह कदम तब आया है जबकि फॉर्म 6 में बदलाव को लेकर देश के एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक अखबार में इस बात का खुलासा किया गया कि फॉर्म 6 में बदलाव को लेकर देश के दो चुनाव आयुक्त सहमत नहीं थे। और उन दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में जिन 14 निर्णयों पर अपनी असहमति दर्ज कराई थी, उनमें एक निर्णय फॉर्म 6 में बदलाव वाला ही था। अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने यह कह दिया है कि उसने फॉर्म 6 में किसी भी बदलाव की मंजूरी नहीं दी थी, तो यह मुद्दा पूरे देश में एक व्यापक मुद्दा बन गया है। दरअसल, उक्त अंग्रेजी दैनिक के समाचार के बाद चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए दूसरे प्रेस रिलीज में, जो कि 26 सितंबर को जारी किया गया, उसमें आयोग ने यह दावा किया था कि फॉर्म 6 में जो अतिरिक्त घोषणा पत्र जोड़ा गया था, उसको सुप्रीम कोर्ट ने वैध माना था। दरअसल देश में व्यापक विवाद को जड़ एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) और यह घोषणा पत्र ही था। चुनाव आयोग को फॉर्म 6 वाले घोषणा पत्र के बिंदु पर अपना जवाब सुप्रीम कोर्ट में देना है, पर ऐसा समझा जाता है कि सुप्रीम कोर्ट का जवाब वही होगा जो कि भाजपा के प्रवक्ता अपने बयानों में बता रहे हैं। भाजपा के प्रवक्ता पणजी के अनुसार फॉर्म 6 में जो अतिरिक्त घोषणा पत्र जोड़ा गया, वह दरअसल फॉर्म 6 में बदलाव नहीं है। वह सिर्फ एक घोषणा पत्र है और फॉर्म 6 के मूल प्रावधानों में कोई बदलाव नहीं किया गया। इस मुद्दे पर कानून के जानकारों की राय भी बंटी हुई है। जो कानून विशेषज्ञ इस घोषणा पत्र को फॉर्म 6 में बदलाव मान रहे हैं, उनका तर्क यह है कि फॉर्म 6 के साथ यह अतिरिक्त घोषणा पत्र फॉर्म 6 में बदलाव माना जाए या नहीं, उसको जानने का एक तरीका है। उसका कहना है कि सवाल यह उठता है कि जिन मतदाताओं ने इस घोषणा पत्र को नहीं भरा या नहीं भर पाए, उनका नाम मतदाता सूची से काटा गया या नहीं? चूंकि ऐसे मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया, उसी से सिद्ध होता है कि फॉर्म 6 में बदलाव किया गया। उनका कहना है कि अगर इस अतिरिक्त घोषणा वाली माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछले एसआईआर में किस वोटर लिस्ट में और किस नंबर पर था, का प्रभाव अगर फॉर्म 6 भरने वाले व्यक्ति के स्टेटस पर नहीं पड़ता तो इसे बदलाव नहीं ही माना जा सकता था। पर चूंकि इस घोषणा के बाद ही फॉर्म 6 भरने वाले व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में शामिल होगा या नहीं, निर्धारित होता है, अतः यह स्पष्ट रूप से फॉर्म 6 में बदलाव है, जिसकी मंजूरी सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दी थी। देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट का रुख इस याचिका पर क्या रहता है? हालांकि विपक्ष और कलेक्टिव जनता पार्टी का यह स्पष्ट कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने भाजपा को कई राज्यों के चुनावों में फायदा पहुंचाने के लिए एसआईआर के माध्यम से करोड़ों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए। और इससे आगे बढ़कर उन्होंने देश से झूठ बोला कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 में बदलावों को मंजूरी दी थी जबकि विपक्ष और कलेक्टिव जनता पार्टी न सिर्फ फॉर्म 6 में बदलावों को लेकर बल्कि पूरे एसआईआर को रद्द करने के लिए तथा ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आर-पार के मूड में है, ज्ञानेश कुमार की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही है। क्योंकि इसी बीच बॉम्बे हाई कोर्ट के गोवा बेंच ने एक परिवार के सदस्यों का नाम मतदाता सूची से हटाने को लेकर यह टिप्पणी की है कि बिना किसी को सुनवाई का मौका दिए उसका नाम वोटर लिस्ट से हटाना गलत है।
अगर ज्ञानेश कुमार का स्टैंड सही था तो फिर यू-टर्न क्यों?-रंजन श्रीवास्तव
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