नई दिल्ली। दहेज हत्या और महिलाओं के खिलाफ क्रूरता से जुड़े मुकदमों में देरी पर चिंता जताते हुए उच्चतम न्यायालय ने सभी अदालतों और सरकारों को 10 विशेष निर्देश जारी किए हैं। न्यायालय ने पुराने मामलों को प्राथमिकता देने, समयबद्ध तरीके से आरोप तय करने और अनावश्यक स्थगन पर रोक लगाने के साथ-साथ न्यायिक अधिकारियों, पुलिस और अभियोजन से जुड़े अधिकारियों के नियमित प्रशिक्षण पर भी जोर दिया है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 20 अगस्त को ये निर्देश जारी किए। न्यायालय उत्तर प्रदेश सरकार बनाम अजमल बेग मामले में दिसंबर 2025 में दिए गए अपने फैसले के अनुपालन की निगरानी कर रहा था। लंबे समय तक मुकदमों के लंबित रहने पर चिंता जताते हुए न्यायालय ने न्यायिक व्यवस्था में तेजी लाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम सुझाए।
उच्चतम न्यायालय ने जिला अदालतों को दहेज हत्या और पत्नी के साथ क्रूरता से जुड़े तीन वर्ष से अधिक पुराने मामलों की पहचान करने और उनकी नियमित प्रगति की समीक्षा करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाना चाहिए, ताकि पीडि़तों और उनके परिवारों को लंबे समय तक न्याय का इंतजार न करना पड़े।
निचली अदालतों को निर्देश दिया गया है कि आरोपपत्र दाखिल होने के बाद 60 से 90 दिनों के भीतर आरोप तय करने की प्रक्रिया पूरी की जाए। इसके बाद साक्ष्य एकत्र करने और मुकदमे की सुनवाई को भी अनावश्यक रूप से लंबा नहीं खींचा जाना चाहिए। न्यायालय ने सुनवाई के दौरान अनावश्यक स्थगन से बचने को कहा है। यदि किसी मामले में स्थगन देना जरूरी हो, तो उसका उचित कारण दर्ज किया जाना चाहिए।
उच्चतम न्यायालय ने सभी उच्च न्यायालयों को दहेज से जुड़े मामलों की चरणवार लंबित स्थिति पर नजर रखने का निर्देश दिया है। पुराने मामलों की पहचान कर उनके शीघ्र निपटारे के लिए आवश्यक चेतावनी और निगरानी व्यवस्था विकसित करने को भी कहा गया है। इसके अलावा उच्च न्यायालयों को पुराने आपराधिक मामलों और दहेज संबंधी अपीलों में लंबित जमानत अर्जियों की समय-समय पर समीक्षा करने को कहा गया है।
न्यायालय ने राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों को न्यायिक अधिकारियों के साथ-साथ पुलिस अधिकारियों, सरकारी अभियोजकों, संरक्षण अधिकारियों और परामर्शदाताओं के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने का निर्देश दिया है। इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों का उद्देश्य दहेज और महिला उत्पीडऩ से जुड़े मामलों की जांच, अभियोजन और सुनवाई की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना है।
न्यायालय ने दहेज और महिलाओं के खिलाफ हिंसा से संबंधित कानूनों को लेकर जनजागरूकता कार्यक्रम बढ़ाने पर भी जोर दिया है। यह मामला 20 वर्षीय एक महिला की मृत्यु से जुड़ा है। उसकी शादी के करीब एक वर्ष बाद उसके ससुराल पक्ष पर रंगीन टेलीविजन, मोटरसाइकिल और 15 हजार रुपये की मांग करने का आरोप लगा था। मामले में निचली अदालत ने महिला के पति अजमल बेग और उसकी मां को दोषी ठहराया था। हालांकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए दोनों को राहत दे दी थी।
इसके बाद मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचा। उच्चतम न्यायालय ने दोनों को दोषी ठहराने वाले निचली अदालत के फैसले को बहाल करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के मूल्यांकन में गलती की थी। मामला वर्ष 2001 का था, जबकि उच्चतम न्यायालय में इसका अंतिम फैसला करीब 24 वर्ष बाद आया। मुकदमे के इतने लंबे समय तक लंबित रहने पर सर्वोच्च अदालत ने गंभीर चिंता जताई।
न्यायालय ने कहा कि दहेज हत्या और महिलाओं के खिलाफ क्रूरता जैसे गंभीर मामलों में न्याय मिलने में अत्यधिक देरी न्याय व्यवस्था के उद्देश्य को प्रभावित करती है। इसी पृष्ठभूमि में अदालत ने पुराने मामलों की पहचान, नियमित निगरानी, समयबद्ध सुनवाई और संबंधित अधिकारियों के प्रशिक्षण समेत 10 निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों का उद्देश्य दहेज और महिला उत्पीडऩ से जुड़े मामलों की सुनवाई में होने वाली देरी को कम करना और पीडि़तों को समय पर न्याय सुनिश्चित करना है।
