बीते कुछ वर्षो से देश में पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग की दर तेजी से बढ़ी है। पहले प्योर पेट्रोल यानी ईंधन में बिना किसी और तरल पदार्थ के मिलावट वाला पेट्रोल दशकों तक इस्तेमाल में रहा। अब केंद्र सरकार इस इथेनॉल ब्लेंडिंग को और बढ़ाने की तैयारी में है। सरकार ने ई-20 से ऊपर वाले पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी यानि उत्पाद शुल्क खत्म करके इसके संकेत मजबूत कर दिए। वह भी तब जब भारत में ई-20 से ऊपर का पेट्रोल चलन में नहीं है। देश में अलग-अलग सरकारों के दौर में इथेनॉल ब्लेंडिंग पहले ई-10 और फिर वर्तमान मोदी सरकार के दौर में ई-20 तक पहुंच गई है। देश में पेट्रोल में इथेनॉल के सम्मिश्रण का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। इसकी शुरुआत 2000 के दशक से ही हुई। हालांकि, केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद से पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को तेजी से बढ़ाया गया। 2014 में पेट्रोल में इथेनॉल को मिलाने का अभियान अपने निम्नतम स्तर पर था। तब पेट्रोल में इथेनॉल की मिक्सिंग 1.5 फीसदी तक सीमित रखी गई थी। यानी पेट्रोल पंपों पर तकरीबन शुद्ध पेट्रोल ही मौजूद था। मोदी सरकार के आने के बाद पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग पर तेजी से काम किया गया। केंद्र सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा 10 फीसदी तक बढ़ा दी। यानी 90 फीसदी पेट्रोल में 10 फीसदी इथेनॉल की मिक्सिंग। इसके बाद 2022 तक ई10 ईंधन देश में मानक बना रहा। पेट्रोल में इथेनॉल को मिलाने की दिशा में एक अहम मोड़ तब आया जब 2021 में नीति आयोग ने भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग 2020-25 के लिए रोडमैप जारी किया। इस रोडमैप के तहत ई20 यानी पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग के लक्ष्य को पाने की समयसीमा 2030 से घटाकर 2025 कर दी गई। 2022 में इस लक्ष्य को देखते हुए सरकार ने राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति 2018 में संशोधन किया, ताकि इस कार्यक्रम को और गति दी जा सके। नतीजतन जून 2022 में तेल विपणन कंपनियों ने निर्धारित लक्ष्य से पांच महीने पहले ही 10 प्रतिशत ब्लेंडिंग का माइलस्टोन हासिल कर लिया। 2023 में इंडिया एनर्जी वीक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ई-20 ईंधन लॉन्च किया और इसे शुरुआत में 11 राज्यों के 84 पेट्रोल पंपों पर रोलआउट किया गया। सरकार ने अप्रैल 2023 से बेचे जाने वाले सभी नए वाहनों के लिए ई-20-अनुरूप (मटेरियल-कंप्लायंट) होना अनिवार्य कर दिया। इसके बाद अप्रैल 2025 से पूरी तरह से ई-20 पेट्रोल के अनुरूप वाहनों की बिक्री शुरू हो गई। 20 प्रतिशत सम्मिश्रण का लक्ष्य भी लगभग छह महीने पहले ही हासिल कर लिया गया। केंद्र सरकार की तरफ से गुरुवार को ई-22, ई-25, ई-27 और ई-30 यानी 22 से 30 प्रतिशत तक इथेनॉल की मौजूदगी वाले पेट्रोल से केंद्रीय उत्पाद शुल्क पूरी तरह हटाया गया है। इसके माध्यम से केंद्र सरकार का मुख्य मकसद कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता में कमी बताया गया है। हालांकि, एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि भारत में अभी ई-20 से ऊपर इथेनॉल ब्लेंड वाला पेट्रोल प्रयोग में ही नहीं है। असल में भारत अपनी तेल खपत का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, जिसकी आपूर्ति का संकट मौजूदा समय में काफी गहराया है। भारत की इथेनॉल उत्पादन क्षमता में हाल के वर्षों में भारी बढ़ोतरी हुई है और वर्तमान में यह 20-21 अरब लीटर प्रति वर्ष तक पहुंच गई है। हालांकि, मौजूदा ई-20 ब्लेंडिंग लक्ष्य के लिए केवल 10-12 अरब लीटर इथेनॉल की ही आवश्यकता होती है। यह फैसला डिस्टिलरी यानि शराब बनाने वाले उद्योग के लिए एक स्पष्ट संकेत है, जिससे वे अपनी बची हुई अतिरिक्त क्षमता, जो वर्तमान में सिर्फ 50 प्रतिशत उपयोग हो रही है, का व्यावसायिक उपयोग कर सकेंगे। इथेनॉल घरेलू स्तर पर मुख्य रूप से गन्ना और मक्का से तैयार किया जाता है, इसलिए उच्च ब्लेंड्स के चलन में आने से इथेनॉल की मांग बढऩे की संभावना है। सरकार का मानना है कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था सशक्त होगी। यही नहीं, यह फैसला कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने और भारत को उसके स्वच्छ ईंधन और पर्यावरण लक्ष्यों की ओर आगे ले जाने में भी एक बड़ी भूमिका निभाएगा।
लेकिन दूसरी तरफ विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि अगर ई-10 और ई-20 पेट्रोल के लिए बनाए गए पुराने और मौजूदा वाहनों में ई22, ई25, ई30 या ई 85 जैसे ज्यादा इथेनॉल वाले पेट्रोल का इस्तेमाल किया जाता है, तो गाडिय़ों पर इसके कई गंभीर और नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं। असल में, उच्च इथेनॉल ब्लेंडिंग का सबसे सीधा असर गाड़ी के माइलेज पर पड़ता है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ई-20 के लिए कैलिब्रेट किए गए वाहनों में 1 से 2 प्रतिशत की ईंधन दक्षता में गिरावट आ सकती है। जबकि सडक़ पर उपभोक्ताओं का अनुभव इससे कहीं अधिक खराब रहा है। लोकल सर्किल्स नाम की संस्था के सर्वे के मुताबिक, कुछ वाहन मालिकों ने ईंधन दक्षता में 20 प्रतिशत तक की कमी की बात कही है। ऐसे में ई-22 से ई-30 पेट्रोल का मार्च 2023 से पहले निर्मित वाहनों के माइलेज पर नकारात्मक असर और भी ज्यादा हो सकता है। एक बात और, इथेनॉल की यह विशेषता होती है कि वह पेट्रोल की तुलना में अधिक तेजी से नमी सोखता है और इसके जलने का तरीका भी अलग होता है। अगर उच्च इथेनॉल, जैसे ई-25 या ई-30 को ई-20 या ई-10 अनुकूल वाहनों में डाला जाता है, तो लंबे समय में यह रबर सील, गैसकेट, फ्यूल लाइन, फ्यूल पंप और इंजेक्टर को नुकसान पहुंचा सकता है। यह पुर्जे इतनी अधिक इथेनॉल सांद्रता को झेलने के लिए डिजाइन नहीं किए गए हैं। नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों को इस बात की चिंता है कि इथेनॉल की मात्रा ई-20 से अधिक करने से लाखों मौजूदा ई-10 और ई-20 वाहनों के माइलेज में गिरावट आएगी और उनके रखरखाव का खर्च बढ़ जाएगा। यही नहीं, गाडिय़ों के खराब होने का सिलसिला भी तेज हो जाएगा। फिलहाल, यही कहा जा सकता है कि सरकार लगातार इथेनाल के ज्यादा प्रतिशत वाले पेट्रोल के उपयोग पर जोर दे रही है, दूसरी तरफ उपभोक्ता इसके लिए अभी तैयार नहीं हो पा रहा है।
