वाशिंगटन/रियाद। मिडिल ईस्ट में दो महीने से जारी भारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान के सामने अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। इस पूरे घटनाक्रम में सऊदी अरब की भूमिका सबसे अहम रही, जिसने ट्रंप के ईरान में ‘तख्तापलट’ के सपने को धराशायी कर दिया। दरअसल, ट्रंप ने जंग की शुरुआत से अब तक तीन बार अपने बयान बदले। 28 फरवरी को उन्होंने दावा किया था कि, अमेरिकी हमलों से ईरान की सत्ता पलट जाएगी, लेकिन सुप्रीम लीडर खामनेई की मौत की अपुष्ट खबरों के बीच यह दावा खोखला साबित हुआ। इसके बाद 7 मार्च को ट्रंप ने सीजफायर वार्ता से इनकार किया, लेकिन अब वे खुद बातचीत की मेज पर आने को मजबूर हो गए हैं।
अमेरिकी मीडिया ‘एनबीसी’ के मुताबिक, ट्रंप की इस रणनीतिक हार के पीछे सऊदी अरब का कड़ा रुख है। अमेरिका ने होर्मुज की नाकाबंदी तोड़ने के लिए ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ शुरू किया था, लेकिन सऊदी ने अंतिम समय पर अमेरिका को अपना एयरस्पेस और सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करने से रोक दिया। सऊदी अरब का स्पष्ट मानना था कि इस युद्ध का सीधा नुकसान खाड़ी देशों को होगा, इसलिए उसने ईरान के साथ समझौते को प्राथमिकता दी। सऊदी के इस ‘खेले’ ने ट्रंप के पास कोई विकल्प नहीं छोड़ा और उन्हें 48 घंटे के भीतर ही प्रोजेक्ट फ्रीडम को रोकने का ऐलान करना पड़ा।
3 अप्रैल को शुरू हुआ यह ऑपरेशन अमेरिकी सेना की देखरेख में होर्मुज में फंसे जहाजों को निकालने के लिए बनाया गया था। इसके विरोध में ईरान की ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड’ ने आक्रामक रुख अपनाते हुए यूएई पर हमले तेज कर दिए थे और सऊदी अरब पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे थे। अंततः, खाड़ी सहयोगियों के दबाव और क्षेत्रीय स्थिरता को देखते हुए ट्रंप ने सरेंडर जैसी स्थिति अपनाते हुए बातचीत की राह चुनी। अब अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि वह ईरान के साथ सीधे संवाद के कारण इस सैन्य ऑपरेशन को खत्म कर रहा है, जो ट्रंप प्रशासन की एक बड़ी कूटनीतिक शिकस्त मानी जा रही है।
