बांग्लादेश में हुए आम चुनाव ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानि बीएनपी को स्पष्ट जनादेश देकर एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत कर दी है। नये पीएम के शपथ समारोह में भारत सहित कई देशों क़ो आमंत्रित किया गया है। साफ तौर पर वहां की अधिसंख्य जनता ने कट्टरपंथियों को नकार दिया है। इस चुनाव को केवल बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को बदलने की प्रक्रिया नहीं नहीं माना जा सकता, जिसका नेतृत्व नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद युनूस कर रहे थे। यह उस गहरे राजनीतिक संकट के बाद देश की दिशा तय करने का प्रयास था, जिसने 2024 में पूरे देश को झकझोर दिया था।
बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के करीब डेढ़ साल बाद हुए चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बहुमत के साथ जीत गई। लेकिन एक खास बात यह देखी गई कि रिकॉर्ड जीत के बावजूद न तो वहां जश्न मना, न जीत के जुलूस निकले। ढाका की सडक़ें सूनी ही रहीं। बीएनपी के चेयरमैन तारिक रहमान ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि जुमे की नमाज के बाद पूरे देश में खास दुआ करें और अल्लाह को शुक्रिया कहें। इसके बाद लोग घरों से निकले, मस्जिदों में नमाज अदा की और लौट गए। ढाका समेत पूरे बांग्लादेश में शांति रही। इसे अच्छी शुरुआत मानी जा रही है।
बांग्लादेश में चुनाव के रिजल्ट से तीन बातें साफ हो गईं हैं। सबसे पहली तो यह कि तारिक रहमान ही देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे। दूसरी, कट्टरपंथी मानी जाने वाली पार्टी जमात की धर्म की राजनीति नहीं चली और शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन करने वाले स्टूडेंट्स को अपनी जगह बनाने में बहुत मेहनत करनी होगी। और तीसरी, अधिकांश लोग शांति और विकास के पक्षधर हैं।
विशेषज्ञों की मानें तो बीएनपी की इस जीत के पीछे हिंदू वोटर, शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग के सपोर्टर और महिलाओं की बड़ी संख्या रही है। इस पूरे चुनाव में केवल चार अल्पसंख्यक, तीन हिंदू और एक आदिवासी उम्मीदवार ही जीतकर संसद में अपनी जगह बनाने में सफल रहे। हालांकि यह आंकड़ा बांग्लादेश में अल्पसंख्यक भागीदारी के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि हिंदू आबादी देश की कुल जनसंख्या का लगभग 8 प्रतिशत है। पिछले 20 वर्षों में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व आम तौर पर 14 से 20 सीटों तक रहता था, लेकिन इस बार यह संख्या बेहद कम रहा। फिर भी, जमात का हारना राहत की बात कही जा सकती है।
चुनाव में कुल 79 अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें बीएनपी के चार विजयी हुए। इसके अलावा, जमात-ए-इस्लामी का हिंदू उम्मीदवार हार गया। यह परिणाम न केवल अल्पसंख्यकों की राजनीतिक भागीदारी पर सवाल खड़े करते हैं, बल्कि देश की बदलती राजनीतिक तस्वीर को भी उजागर करते हैं। इतना ही नहीं विशेषज्ञों का तो यह भी मानना है कि इस जीत और हार का संकेत यह देता है कि बांग्लादेश की राजनीति में अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा और प्रतिनिधित्व अभी भी चुनौतीपूर्ण मुद्दा बना हुआ है।
चुनाव प्रचार की बात करें तो तारिक ने भारत के पीएम नरेंद्र मोदी की चाय पर चर्चा की तर्ज पर, चायेर अड्डा (चाय पर बातचीत) का आयोजन किया। यह विचार तारिक रहमान की बेटी, जैमा रहमान द्वारा लाया गया था। इसमें देश भर में विशेष रूप से युवाओं के साथ, अनौपचारिक बातचीत करना और उनसे फीडबैक प्राप्त करना शामिल था। दूसरा महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम तारिक रहमान को एक सहज और अनौपचारिक नेता के रूप में पेश करना था, जो सत्ता के मद में चूर नहीं है। 4 करोड़ से अधिक पहली बार वोट देने वाले युवा से जुडऩे में उन्हें सफलता मिली। पार्टी ने मुझे सर नहीं, भाई कहो का नारा अपनाया, जो भारत में राहुल गांधी द्वारा छात्रों के साथ बातचीत के दौरान अपनाए गए इसी तरह के दृष्टिकोण की याद दिलाता है। इसका उद्देश्य मतदाताओं के साथ सीधे और भावनात्मक रूप से जुडऩा था।
युवाओं को लुभाने के लिए, पार्टी ने रील-मेकिंग प्रतियोगिताओं का आयोजन किया। बांग्लादेश में उभरते हुए यू ट्यूबर्स और कंटेंट क्रिएटर्स को अपने विचारों और सुझावों के साथ रील बनाने के लिए आमंत्रित किया गया। विजेताओं को पुरस्कृत किया गया और उनकी रीलों को बीएनपी के आधिकारिक हैंडल से भी शेयर किया गया। इसमें सफलता भी हासिल हुई।
बीएनपी को भारी बहुमत तो मिल गया है, लेकिन तारिक रहमान के सामने चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। जमात-ए-इस्लामी को 77 सीटें मिली हैं, और ये उनके लिए एक चुनौती भी है। इसके अतिरिक्त, जमात ने वोट में धांधली के आरोप लगाए हैं। इन सब चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए रहमान के पोस्टरों पर टैगलाइन आई हैव अ प्लान (मेरे पास एक योजना है) लिखी गई थी, जो बराक ओबामा के अभियान मंत्र यस, वी कैन की याद दिलाती है।
यह चुनाव अभियान यह दर्शाता है कि आधुनिक राजनीतिक रणनीतियां भौगोलिक सीमाओं को पार कर रही हैं। इसके साथ ही नतीजे यह भी दिखाते हैं कि बांग्लादेश वैचारिक ध्रुवीकरण से थक चुका है और स्थिरता तथा आर्थिक प्रगति चाहता है। राजनीतिक इस्लाम की उपस्थिति बढ़ी है, पर उसने मुख्यधारा की सत्ता को प्रतिस्थापित नहीं किया। बीएनपी के सामने अवसर है कि वह अपने जनादेश का उपयोग लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने और समावेशी शासन देने के लिए करे। यदि सत्ता का प्रयोग प्रतिशोध के बजाय सुधार के लिए किया जाता है, तो बांग्लादेश अधिक संतुलित और स्थिर भविष्य की ओर जा सकता है। देखना होगा कि तारिक की आगामी रणनीति क्या होती है? खास तौर पर पड़ोसियों के मामले में क्या रणनीति अपनाते हैं, यह देखना होगा।
