शक्तिपीठ दर्शन: इस नवरात्रि पहुँचें कांगड़ा, माँ सती के पावन धाम ‘नगरकोट’

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नई दिल्ली। हम बात कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा में स्थित ऐतिहासिक श्री बज्रेश्वरी देवी मंदिर की। चैत्र नवरात्र के खास मौके पर, आइए जानते हैं ‘नगरकोट कांगड़ा वाली देवी’ के नाम से मशहूर इस चमत्कारी शक्तिपीठ की कुछ बेहद खास और रोचक बातें, जिन्हें पढ़कर आपका मन भी यहां दर्शन करने को मचल उठेगा। आपको बता दें की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कांगड़ा का यह ऐतिहासिक मंदिर एक प्रमुख शक्तिपीठ है। ऐसा माना जाता है कि यहां माता सती का दाहिना वक्ष गिरा था। इस मंदिर में मां बज्रेश्वरी एक ‘पिंडी’ के रूप में विराजमान हैं। लोगों का अटल विश्वास है कि जो भी भक्त सच्चे मन से यहां आकर मां के दर्शन कर लेता है, उसके जीवन के सारे कष्ट और दुख पल भर में दूर हो जाते हैं। यह हिमाचल प्रदेश का सबसे भव्य और सुंदर मंदिर माना जाता है। बता दें, 4 अप्रैल 1905 को आए एक भयंकर भूकंप में यह मंदिर पूरी तरह जमींदोज हो गया था। इसके बाद इसे एक नई ‘दक्षिण शैली’ में दोबारा बनाया गया।

वहीं इस मंदिर की वास्तुकला की सबसे बड़ी खासियत इसके तीन गुंबद हैं, जो सर्वधर्म समभाव का खूबसूरत संदेश देते हैं। पहला गुंबद: यह सिख धर्म के गुरुद्वारे के आकार का है। दूसरा गुंबद: यह इस्लाम धर्म की मस्जिद के आकार का है। तीसरा गुंबद: यह हिंदू संस्कृति के तहत एक पारंपरिक मंदिर के आकार का है। चैत्र नवरात्रों में यहां उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन मकर संक्रांति पर यहां का नजारा बिल्कुल अलग होता है। हिमाचल प्रदेश में यह इकलौता ऐसा शक्तिपीठ है, जहां मकर संक्रांति के खास मौके पर देसी घी से मक्खन तैयार किया जाता है और उससे माता की पिंडी पर एक बहुत ही सुंदर ‘घृत मंडल’ सजाया जाता है। मंदिर के प्रांगण में उत्तर प्रदेश के आगरा के रहने वाले ‘ध्यानू भक्त’ की प्रतिमा स्थापित है। कहा जाता है कि उन्होंने इसी प्रांगण में अपनी गर्दन काटकर देवी मां के दरबार में अर्पित कर दी थी। आज भी यूपी और राजस्थान से लाखों लोग उनके दर्शन करने आते हैं।

मान्यता है की जब बरसात के मौसम में बारिश नहीं होती और सूखा पड़ता है, तो ध्यानू भक्त की मूर्ति पर गोबर का लेप लगाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने पर बारिश हो जाती है, जिससे किसानों और आम जनता को भयंकर गर्मी से राहत मिलती है। जब बारिश हो जाती है, तो मूर्ति को ‘पंच स्नान’ करवाकर उस गोबर को साफ कर दिया जाता है।

पीले वस्त्र और पीतल का कड़ा: भक्त पीले कपड़े पहनकर मंदिर पहुंचते हैं। वापसी में वे पहाड़ी शैली में बना ‘पीतल का कड़ा’ पीले प्रसाद के रूप में खरीदकर अपनी कलाई में पहनते हैं। इस कड़े को पहनकर घर जाना बहुत शुभ माना जाता है।

सिंदूर का छाप: श्रद्धालु अपनी यात्रा शुरू करने से पहले अपने गांव में सीधे हाथ का लाल सिंदूर का छाप लगाते हैं। जब वे मंदिर में देवी दर्शन कर लेते हैं, तो स्थानीय पुजारी उनकी पीठ पर अपने हाथ का छाप लगाते हैं। यह छाप लगने के बाद ही उनकी तीर्थ यात्रा पूरी मानी जाती है।

वंशावली का रिकॉर्ड: इस मंदिर की एक खासियत यह भी है कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा से आने वाले ज्यादातर श्रद्धालुओं के परिवारों का पूरा रिकॉर्ड यहां के पुजारियों के पास हमेशा उपलब्ध रहता है। यात्रा का पंजीकरण कराना भी यहां शुभ माना गया है।

सड़क मार्ग: हिमाचल प्रदेश के प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग द्वारा यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। इसके अलावा, यह मंदिर पठानकोट से 80 किलोमीटर और चंडीगढ़ से 220 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

रेल मार्ग: आप पठानकोट से जोगिंदर नगर जाने वाली नैरोगेज रेलवे लाइन का इस्तेमाल कर सकते हैं। कांगड़ा रेलवे स्टेशन से यह मंदिर महज 3 किलोमीटर की दूरी पर है।

हवाई मार्ग: सबसे नजदीकी एयरपोर्ट कांगड़ा है, जो मंदिर से सिर्फ 9 किलोमीटर दूर है। यहां दिल्ली, जयपुर, शिमला और चंडीगढ़ से रेगुलर फ्लाइट्स आती हैं।