देश हमारा, सबसे प्यारा – गिरीश पंकज

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खाड़ी में चल रहे युद्ध के कारण करोड़ों भारतीय विभिन्न देशों में फंसे हुए हैं। सब भारत आना चाहते हैं, यानी अपने देश लौटना चाहते हैं। सुरक्षित लौटना चाहते हैं। मतलब यह कि घोर संकट में अंतत: अपना देश ही याद आता है। बाकी समय कहां का देश, कैसा भारत? कोरोना काल में विभिन्न शहरों में काम कर रहे लोग जब बेरोजगार हो गए तो उन्हें अपना गांव, अपना कस्बा याद आया। विदेश में काम कर रहे भारतीयों के लिए भारत ही उनका गांव हैं, जहां वे लौट कर सुरक्षित रहना चाहते हैं। यह बड़ी बात है और चिंतन के लिए विवश करने वाली है कि संकट के समय हमें अपना देश, अपनी जमीन, अपनी मिट्टी याद आती है। और हमारा राष्ट्र बिना किसी हिचक के अपने भारतवासियों को सुरक्षित लाने की व्यवस्था भी करता है। खाड़ी युद्ध के पहले भी अनेक अवसर आए हैं,जब किसी देश में कोई आपदा आई,तो वहां के भारतीयों को सुरक्षित वापस लाने के कोशिश हमारे देश ने की। यह सब देखकर उन लोगों को सबक सिखाना चाहिए कि अंतत स्वदेश सबसे बड़ी चीज है। उसके प्रति हमारे मन में प्यार होना चाहिए।ठीक है कि हम नौकरी के लिए दुनिया के किसी कोने में चले गए, लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि अपनी आय का एक हिस्सा अपने देश के उन्नयन में लगातार लगाना चाहिए। हम जिस मिट्टी में पले-बढ़े, उस मिट्टी के प्रति हमारा कुछ कर्तव्य है। जिस गांव-कस्बे से हम निकले, वहां विकास का कोई कार्य करना ही चाहिए। कोई भवन बनाएं। तालाब बनवाएं। वहां की किसी प्रतिभा को आर्थिक मदद करें। जितना हो सकता है, करने की कोशिश करें। यही है अपने देश के ऋण से उऋण होने की कोशिश। कुछ निर्मम और गद्दार किस्म के लोग यह भी कह सकते हैं कि ‘देश ने हमें क्या दिया, हम यहां पैदा हुए, घर वालों ने पाला-पोसा, हम योग्य हुए और अपनी प्रतिभा के बल पर विदेश जाकर नौकरी कर रहे हैं। इसमें देश का क्या योगदान?Ó ऐसा नकारात्मक सोचने वाले अनेक लोग हैं। लेकिन उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि आखिर इसी देश की मिट्टी में तो पले-बढ़े। इसी देश का अन्न-जल ग्रहण कर के वे संपुष्ट हुए। इसी देश में विद्या अध्ययन करके उन्होंने कुछ ज्ञान अर्जित किया, जिसके बलबूते वे विदेश में कहीं जाकर नौकरी कर रहे हैं,या स्वरोजगार। वे यह सब कर पाने में सक्षम इसलिए हुए कि उनके देश ने उन्हें शारीरिक और बौद्धिक दृष्टि से मजबूत किया। इस बात को भूलना नहीं चाहिए। जो भूल जाते हैं वे एहसानफरामोश होते हैं। लेकिन ऐसे ही बहुत से लोग जब विदेश में कहीं संकट में फंसते हैं तो सबसे पहले अपने देश की ओर देखते हैं और गुहार लगाते हैं कि हमें वापस बुला लो, हमें सुरक्षित निकालो। भारत एक उदारवादी राष्ट्र है। वह देश छोड़कर विदेश जाने वाले लोगों का भी तहेदिल से स्वागत करता है। कभी-कभी ऐसे मौके आते रहते हैं। उसमें को याद करते हुए विदेश में काम करने वाले आप्रवासी भारतीयों को अपने राष्ट्र के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। और राष्ट्र के उन्नयन में अपना योगदान निरंतर करते रहना चाहिए। यह भी एक तरह से देश भक्ति है। राष्ट्रकवि गयाप्रसाद शुक्ल सनेही की यह कविता हमेशा याद रखनी चाहिए, जिसमें वह कहते हैं ‘जो भरा नहीं है भावों से, जिसमें बहती रसधार नहीं/ वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।