यह सर्वविदित है कि इतिहास का पन्ना पलटें तो हर सभ्यता ने अपने कई कई रूप बदले हैं। संस्कृति ने नए-नए आयाम का सृजन किया है। वैसे भी जीवन परिवर्तन का पर्याय और विकास का स्वरूप है। यह सर्वकालीन सत्य है कि शिक्षा एवं ज्ञान का महत्व हर संस्कृति, सभ्यता और मानवीय समुदाय के जीवन में एक प्रकाश पुंज की तरह उन्हें विकास की दिशा दिखाते हुए आया है। जिस देश की भाषा जितनी समृद्ध होगी उस देश की सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान उत्तम शिखर पर होगा और विकास की नई-नई धाराएं बहेगी। मानवीय विकास के साथ मनुष्य को अधिक परिपक्व को समझदार तथा समृद्ध बनाने में शिक्षा,भाषा, ज्ञान और साहित्य का सर्वाधिक महत्व रहा है। शिक्षा चाहे आपके परिवार से प्राप्त हुई हो, स्कूल-कॉलेज अथवा किसी शिक्षण संस्थान से प्राप्त हुई हो या भारतीय संस्कृति के वैदिक शास्त्रों से प्राप्त हुई हो, शिक्षा का मनुष्य के व्यक्तित्व के निर्माण में बड़ी अहम भूमिका होती है। शिक्षा भी समाज संस्कृति एवं सभ्यताओं के साथ परिवर्तनशील तथा प्रगतिशील है। शिक्षा, ज्ञान तथा संस्कृति और कला साहित्य को देश और विदेश की सीमाओं में बांधा नहीं जा सकता है। यह असीमित भंडार है एवं इसमें आकाशीय ऊंचाइयां भी शामिल रहती हैं। शिक्षा और ज्ञान की गहराइयां नापी नहीं जा सकती है और न ही इसकी ऊंचाई को देखा जा सकता है। पूर्वी सभ्यता जहां अध्यात्म, वेद, पुराणों पर अवलंबित है, वहीं पश्चिमी सभ्यता ज्ञान विज्ञान नए-नए अविष्कार और आकाश की अनछुई कई बातों को उजागर करने वाली है। ऐसी शिक्षा तथा ज्ञान के कारण मानव चंद्रमा पर पहुंचकर एक नई गाथा लिख पाया है। वस्तुत: पूर्व तथा पश्चिम ज्ञान-विज्ञान तथा शिक्षा के मामले में एकाकार हो चुका है। कोई भी भेदभाव या विभाजन रेखा नहीं खींची जा सकती है। पूरी सभ्यता ने जहां पाश्चात्य दर्शन से नए-नए अविष्कारों हवाई जहाज, इंजन, ग्रामोफोन, रेडियो एवं नई-नई टेक्नोलॉजी को अपनाया है। वहीं, पश्चिमी दर्शन ने भारती ज्ञान विज्ञान संस्कार आयुर्वेद, योग धर्म दर्शन को अपनाकर अपनी जीवनशैली में शांति तथा सौभाग्य स्थापित किया है। यह सब शिक्षा, भाषा एवं ज्ञान की बदौलत पूर्व और पश्चिम का मेल संभव हो पाया है। शिक्षा और भाषा सदैव ही अज्ञानता के तमस में एक प्रकाश पुंज की तरह देदीप्यमान होता रहा है। नवजीवन की विकास धारा में सदैव महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है। हमारे कई धर्मों में जिनमें जैन, बौद्ध दर्शन, नव्य वेदांत तथा भारतीय संस्कृति के नवीन चिंतन के सामने आने से नवयुग की कल्पना को साकार किया है। पश्चिम के कई विद्वान और चिंतक जिनमें प्लूटो, अरस्तु, सुकरात, कार्ल मार्क्स, लेनिन ने अनेक विकास के सिद्धांतों को प्रतिपादित किया है। जिसका पूरे विश्व ने खुले दिल से स्वागत किया एवं विकास की नई नई की इबारत लिखी है। दूसरी ओर भारत की संस्कृति, सभ्यता और समाज में सदैव आवश्यक सुधार तथा नई नई बुद्धिमता पूर्ण युक्तियों को अपने में आत्मसात करने की एक अलग क्षमता रही है और विकास का मूल मंत्र भी परिवर्तनशील जीवनशैली ही है। राजनीति तो सदैव परिवर्तन पर अवलंबित रहती है। स्वतंत्रता के पहले तथा बाद में राजनीतिक घटनाक्रम जिस नव परिवर्तन युग की तरफ अग्रसर हुए हैं वह अत्यंत उल्लेखनीय है। भारतीय सभ्यता समाज और संस्कृति जितनी जटिल तथा गूढ़ है उसको जितना समझा जाए, उसका जितना अध्ययन किया जाए तो उससे नवीन बातें समझ में आती है। उसके नए-नए अर्थ हमारे सामने आते हैं, जिसका बहु आयामी उपयोग हम अपनी जीवनशैली में परिवर्तन करने के लिए सदैव कर सकते हैं। स्वतंत्रता के बाद तो भारत ने ज्ञान, भाषा तथा संस्कृति में अनेक परिवर्तन किए। गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, बाल गंगाधर तिलक, सुभाष चंद्र बोस आदि ने अपनी किताबों में नव परिवर्तन के नए-नए आयामों तथा जीवन शैली के सत्य के साथ प्रयोग को एक नया आयाम दिया है और भारत देश को नए स्वरूप में विश्व में पहचान दिलाई है। पाश्चात्य ज्ञान से हमें अपने आडंबर एवं अंधविश्वास तथा शिक्षा पर विजय प्राप्त करने में काफी मदद प्राप्त हुई है। भारतीय संस्कृति की कई भ्रांतियों को भी हमने ज्ञान तथा भाषा के नवीन प्रयोगों से समाज से दूर किया है। दिन प्रतिदिन जीवन की कार्यशैली में हम यह महसूस करते हैं कि शिक्षा भाषा तथा ज्ञान हमें यह महसूस कर आते हैं कि हम अभी तक कितने पीछे हैं एवं हमें कितने ज्ञान की और आवश्यकता है।
शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान के बगैर राष्ट्र अधूरा – संजीव ठाकुर
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