(व्यंग)
आजकल साहित्य जगत में साहित्य नहीं, स्कीम चल रही है। रचना नहीं, रिलेशन मैनेजमेंट लिखा जा रहा है और कवि? कवि अब व्यक्ति नहीं, ब्रांड है
जिसके साथ कॉम्बो ऑफ़र अनिवार्य है। मेरे एक मित्र ने भोलेपन में एक साहित्यिक आयोजन कर डाला। भोले थे इसलिए कि उन्होंने सोचा मुख्य अतिथि साहित्य जगत से ही आएगा,बाकी लोग अपनी-अपनी कुर्सी लेकर खुद आ जाएँगे। उन्होंने एक तथाकथित बड़े साहित्यकार को फोन किया। उधर से आवाज़ आई आइडिया अच्छा है पर पहले शर्तें समझ लीजिए,मित्र सतर्क हो गए, साहित्य में शर्तें वही होती हैं जो प्रेम में शादी करने का झूठा वायदा और राजनीति में घोषणा पत्र। साहित्यकार बोले यदि मैं मुख्य अतिथि बन कर आऊँ, तो मेरे साथ चार लोग फ्री आएँगे, फ्री?” मित्र ने पूछा।
“हाँ, साहित्य में अब एक पर एक नहीं, एक पर चार चल रहा है।”सूची पढ़ी गई। एक अध्यक्ष (जो हर जगह अध्यक्ष ही होते हैं),एक विशिष्ट अतिथि (जो विशिष्ट इसलिए हैं क्योंकि हर मंच पर दिखते हैं), एक मित्र जो तालियाँ गिनता है।और एक ऐसा व्यक्ति जिसे कोई नहीं जानता,पर हर फोटो में सबसे आगे दिखता है। मित्र ने डरते-डरते कहा सर, अध्यक्ष और विशिष्ट अतिथि तो तय हैं।” उधर से आवाज़ अचानक गंभीर हो गई। “तो फिर मुझे क्यों बुला रहे हैं?
मैं अकेला आकर साहित्य को क्या मुँह दिखाऊँगा?”
फिर शर्तें और स्पष्ट की गई ,माला फूलों की नहीं, प्रतिष्ठा की होनी चाहिए। परिचय में ‘वरिष्ठ’, ‘महान’ और ‘युगद्रष्टा’ शब्द न्यूनतम तीन बार बोला जाना होगा।कविता के बाद तालियाँ इतनी देर चलें
कि आत्मा पूरी तरह तर हो जाए,और हाँ
मंच से उतरते समय कोई बोले
महोदय आज का कार्यक्रम आपके बिना अधूरा रहता।” मित्र का सिर घूम गया।
उन्होंने विनम्रता से कहा सर, आप मुख्य अतिथि बन जाइए बस,
बाकी पद हम सम्हाल लेंगे।”
साहित्यकार ने अंतिम निर्णय सुनाया
“नहीं। आजकल साहित्य खुदरा नहीं बिकता या तो पूरा पैकेज लीजिए,
या फिर मुझे मत बुलाइए।”
फोन कट गया।
मित्र देर तक फोन को देखते रहे, जैसे कविता ने अचानक अनुबंध माँग लिया हो।
कार्यक्रम हुआ। मुख्य अतिथि नहीं आए। पर आश्चर्य यह कि पूरा का पूरा साहित्य आ गया।
बिना टीम, बिना शर्त, बिना पैकेज।
कविता ठीक से सुनी गई।तालियाँ मन से बजीं और मंच पर बैठे लोग
घर जाकर भी वही रहे जो मुख्य अतिथि बने थे। पीछे से किसी ने कहा
आज बड़े लोग नहीं आए।”
मित्र मुस्कुराए कहा हाँ, आज साहित्य ऑफ़र में नहीं था। इसलिए शायद वह पूरी ईमानदारी से मौजूद था।
कविता
व्यंग्य कविता,
संजीव-नी।
मुस्कुराइए, आप सम्मानित हैं।
मुस्कुराइए,
आप मंच पर है
यह प्रमाण है
कि आप मान्य हैं।
गले में फूलों की माला,
फूलों को नहीं पता
वे क्यों लटके हैं,
जैसे कई बार
सम्मानित को भी
नहीं पता होता।
शॉल ओढ़ा दी गई
ठंड नहीं
पर फिर भी,
सम्मान को अक्सर
ढककर ही दिया जाता है।
माइक कह रहा
इनका योगदान अतुलनीय है
योगदान मंच खोज रहा है,
पर तालियाँ पहले ही
उसे स्वीकार कर चुकी हैं।
आपमें कोई खूबी हो
तो अच्छी बात है
न हो
तो भी कार्यक्रम नहीं रुकता।
क्योंकि यहाँ
योग्यता नहीं,
ओहदा गिना जाता है।
आप सिर हिलाते मुस्कुराते
आपकी यह सबसे सुरक्षित कविता है।
शब्दों से ज़्यादा
आज मौन सराहा जाता
फोटो ली जाती है
इतिहास वहीं रुक जाता
अगले सम्मान तक।
माला उतरती ,
किसी और का गला खोजती है,
सम्मान घूमता रहता
जैसे वही असली अतिथि हो।
आप मंच से उतरते
हल्के होकर नहीं,
बस खाली होकर।
कल फिर किसी और मंच पर
आपका नाम पुकारा जाएगा,
क्योंकि इस समय
सम्मान सबसे सस्ता है,
और मुस्कान सबसे सुरक्षित
तो मुस्कुराइए
आप सम्मानित हैं,
कम से कम
आज की तस्वीर में।
संजीव ठाकुर, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415
