अमेरिका के निशाने पर लंबे समय से ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ही थे। यही कारण है कि जब अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता का नाटक चल रहा था, उसी दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने हमले का आदेश दे दिया। अगर यह वार्ता जारी रहती और किसी अंजाम तक पहुंचती, तो हमले का कोई और बहाना तलाश लिया जाता।
अमेरिका भले ही ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों की बात कर रहा हो, लेकिन उसके निशाने पर ईरान के सर्वोच्च नेता ही थे। और हाल में तो ट्रंप ने इतना लिहाज करना भी छोड़ दिया था कि वह खामेनेई की मौत चाहते हैं। लेकिन, अब जब खामेनेई मारे जा चुके हैं, तब भी शायद अमेरिका के लिए यह लड़ाई खत्म न हो। अमेरिका पश्चिम एशिया में अपना प्रभुत्व कायम करना चाहता है, इसे देखते हुए ही उसने इसरायल का साथ दिया।
शाह के विरोधी, अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के सबसे करीबी सहयोगी, फिर राष्ट्रपति और सुप्रीम लीडर तक-खामेनेई की तमाम भूमिकाओं का ईरान पर करीब पांच दशकों तक असर रहा। जैसे-जैसे वह मजबूत होते गए, अमेरिका के साथ उनका टकराव भी बढ़ता गया। ट्रंप उन्हें सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे। उनके जाने के बाद ईरान और अमेरिका समेत बाकी दुनिया के लिए भी यह सवाल बेहद अहम हो जाता है कि अब आगे क्या होगा।
ईरानी मीडिया में जो खबरें आ रही हैं, उनके अनुसार अयातुल्ला अलीरेजा अराफी को अंतरिम सुप्रीम लीडर चुना गया है। स्थायी व्यवस्था तक उनके पास जिम्मेदारी रहेगी। सर्वोच्च पद के लिए खामेनेई के बेटे मोजतबा का नाम भी चर्चा में चल रहा है, लेकिन वह अभी तक अयातुल्लाह के पद तक नहीं पहुंचे हैं। हालांकि इतना तय लग रहा है कि बदली स्थितियों में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्र्स की भूमिका और ज्यादा बढऩे वाली है।
ट्रंप चाहते थे कि ईरान की सत्ता से खामेनेई हट जाएं और अब खामनेई खत्म हो चुके हैं, लेकिन ईरान में सिस्टम तो अब भी पुराना ही है। आईआरजीसी को खामेनेई ने खड़ा किया है। नेतृत्व के स्तर पर उसे झटका जरूर लगा है, पर उसकी ताकत अब भी कायम है। पूरे खाड़ी क्षेत्र में हमले तेज कर उसने इसका सबूत भी दे दिया है। खाड़ी देशों में अमेरिका के एयर बेस और पोर्ट भी उसके निशाने पर रहे हैं। होर्मुज स्ट्रेट में भी ऑयल टैंकर को निशाना बनाया गया।
एक बात और, ईरान की बात करते हुए ट्रंप वहां की जनता का जिक्र अवश्य करते हैं। हालांकि हकीकत यह है कि ईरान पर हमले के विरोध में अमेरिका तक में प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। ईरान में सत्ता के खिलाफ बहुत गुस्सा था, इसके बावजूद ईरानी जनता का एक तबका खामेनेई के साथ था। देखा जाए तो अमेरिका का खुद का अतीत भी कोई सकारात्मक नहीं रहा। जिन देशों में उसने सत्ता परिवर्तन कराया, वहां हालात पहले से और भी बदतर हो गए। ईरान को लेकर भी डर है कि कहीं पूरा इलाका लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष में न घिर जाए, जैसा कि कई देशों में हो रहा है।
सही मायने में अमेरिका की लंबे समय से रणनीति यही रही है कि पूरी दुनिया में कैसे भी हो, उसका राज रहे। उसके हिसाब से देशों की सरकारें चलें। ईरान और ऐसे कई देश हैं, जो यह नहीं कर रहे थे। वहां कट्टरपंथ हावी था, यह अलग बात है, लेकिन वो किसी और के रिमोट से चलने के लिए तैयार नहीं थे। यही कारण है कि लगातार अमेरिका की नजर उन देशों पर बनी रही।
अफगानिस्तान पर भी अमेरिका की लगातार नजर रही, लेकिन वहां कई दशक बाद भी वो न तो संघर्ष रुकवा पाया और न ही शांति स्थापित कर सका है। स्थाई सरकार वहां आज भी सपना ही है। अब तो पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच भी जंग के हालात हैं, इसके पीछे भी अमेरिका की रणनीति ही है। दरअसल, ट्रंप न केवल तानाशाही मानसिकता वाले व्यक्ति हैं, अपितु अस्थिर दिमाग वाले भी हैं। अमेरिका के लोग ही उन्हें पसंद नहीं करते हैं।
फिलहाल, इसरायल और ईरान के बीच युद्ध कब और कैसे बंद होगा, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन अन्य कई देश इसकी जद में आ गए हैं, वहां के हालात खराब हो रहे हैं। यदि कहीं रूस ईरान के साथ खड़ा हो गया, तो विश्व युद्ध के हालात की आशंका बलवती हो जाएगी। ऐसी स्थिति से बचना ही होगा, लेकिन ट्रंप पर किसी भी मामले में भरोसा नहीं किया जा सकता। उम्मीद ही की जा सकती है कि ये जंग किसी तरह से रुक जाए।
