व्यायाम के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी करें कुछ अच्छा काम, साइंटिस्ट्स की माने

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नई दिल्ली। एक नई स्टडी के मुताबिक, शारीरिक गतिविधि के ऐसे प्रोग्राम जो पैदल चलने, साइकिल चलाने और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देते हैं, वे न सिर्फ़ जलवायु परिवर्तन को कम कर सकते हैं, बल्कि लोगों की सेहत और समानता में भी सुधार ला सकते हैं। न्यूज़ीलैंड की ऑकलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने एक नया कॉन्सेप्चुअल फ़्रेमवर्क तैयार किया है, जिसे ‘शारीरिक गतिविधि और जलवायु परिवर्तन मॉडल’ (Physical Activity and Climate Change Model) नाम दिया गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह मॉडल शारीरिक गतिविधि और जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों को एक साथ सुलझाने के लिए एक गाइड का काम कर सकता है। यह मॉडल ‘नेचर हेल्थ’ (Nature Health) जर्नल में प्रकाशित हुआ था। विशेषज्ञों का कहना है कि शारीरिक गतिविधि और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों को अलग-अलग सुलझाने के बजाय, उन्हें एक साथ सुलझाने से लोगों की सेहत और पर्यावरण को ज़्यादा फ़ायदे होंगे। लोगों को शारीरिक रूप से सक्रिय बनाने के लिए अभी जो कोशिशें की जा रही हैं, वे काफ़ी नहीं हैं। अपने पहले रिसर्च पेपर में, शोधकर्ताओं ने कहा कि पब्लिक हेल्थ और सामाजिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए मिलकर काम करने की ज़रूरत है।

वहीं इस मॉडल के अनुसार, गर्मी की लहरों और बाढ़ जैसी मौसम की चरम स्थितियाँ लोगों के बाहर निकलने और कसरत करने में रुकावट बन रही हैं। इससे पैदल चलने और साइकिल चलाने जैसी गतिविधियों में लोगों की भागीदारी कम हो रही है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, पैदल चलने, साइकिल चलाने और पब्लिक ट्रांसपोर्ट के इस्तेमाल को बढ़ाकर वाहनों पर निर्भरता कम की जा सकती है। इससे कार्बन उत्सर्जन कम होगा और पर्यावरण को फ़ायदा होगा। एक और रिसर्च पेपर ‘नेचर मेडिसिन’ (Nature Medicine) जर्नल में प्रकाशित हुआ था। इसमें 68 देशों के डेटा का विश्लेषण किया गया था। इसमें पाया गया कि अमीर देशों के अमीर पुरुषों में मनोरंजन के लिए कसरत करने की संभावना ज़्यादा थी। वहीं, गरीब देशों की गरीब महिलाओं में ऐसा करने की संभावना काफ़ी कम थी। इन दोनों समूहों के बीच लगभग 40 प्रतिशत का अंतर था। हालाँकि, गरीब समूहों में भी शारीरिक गतिविधि काफ़ी आम थी।

‘नेचर हेल्थ’ में प्रकाशित एक तीसरे रिसर्च पेपर में, 2004 से 2025 के बीच 200 देशों की 661 राष्ट्रीय नीतियों का अध्ययन किया गया। इसका मुख्य निष्कर्ष यह था कि कई देशों में शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा देने के लिए नीतियाँ तो हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन बहुत कमज़ोर है। 661 नीतियों में से, केवल 38.7% (256 नीतियाँ) में ही स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे तीन या उससे ज़्यादा सरकारी क्षेत्रों में उन्हें लागू करने के लिए कदम उठाए गए थे। शोधकर्ताओं ने 46 प्रमुख लोगों (सरकारी अधिकारियों, शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं और नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधियों) का इंटरव्यू भी लिया। उनके अनुसार, शारीरिक गतिविधि को राजनीतिक प्राथमिकता न मिलने का मुख्य कारण यह है कि इसे ठीक से लागू नहीं किया जा रहा है। हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि इसमें धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। ऐसी नीतियाँ जो पैदल चलने, साइकिल चलाने और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देती हैं, वे न केवल लोगों के स्वास्थ्य में सुधार करती हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन को कम करने में भी अहम भूमिका निभाती हैं। यही कारण है कि शोधकर्ताओं का सुझाव है कि भविष्य में इन दोनों पहलुओं को एक साथ देखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।