भाजपा के तरकश में सत्ता परिवर्तन का मुद्दा, विपक्ष रक्षात्मक- रंजन श्रीवास्तव 

Follow Us

पिछले लगभग छह महीनों से राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) और उसके बाद वोट चोरी जैसे मुद्दों पर विपक्ष तथा कॉकरोच जनता पार्टी के लगातार हमलों के बीच भारतीय जनता पार्टी को रेजीम चेंज (सत्ता परिवर्तन) जैसे मुद्दे से अचानक संजीवनी मिल गई है। इसके बाद वह न केवल विपक्षी राजनीतिक दलों, बल्कि कॉकरोच जनता पार्टी पर भी जोरदार हमला कर रही है। सत्ता परिवर्तन के मुद्दे पर सत्तापक्ष को अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी खुला समर्थन मिल गया है। भाजपा को पहली सफलता तब मिली, जब विपक्ष इस मुद्दे पर सफाई देने लगा और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने युवा आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल नेहा बोरा के बयान से दूरी बनानी शुरू कर दी। दूसरी सफलता तब मिली, जब कॉकरोच जनता पार्टी के दो प्रमुख नेताओं आशुतोष रांका और सौरव दास को जेल भेजे जाने के बाद अदालत से उन्हें राहत नहीं दी। विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने उनकी न्यायिक हिरासत दो दिन के लिए बढ़ा दी। जब वे उच्च न्यायालय पहुंचे, तो वहां भी उनके खिलाफ ऐसी टिप्पणी की गई, जिससे कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं का मनोबल प्रभावित होना स्वाभाविक है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के मुद्दे पर बुरी तरह घिरे मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार का लगातार बचाव कर रहे सत्तापक्ष को आईसा (आल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने अचानक सत्ता परिवर्तन का मुद्दा दे दिया। उन्होंने 14 अक्टूबर को अपने बयान में कहा कि बांग्लादेश के युवा आंदोलन ने भारत के युवाओं को रास्ता दिखाया है। हालांकि, उन्होंने इसे लोकतंत्र और मताधिकार की लड़ाई से जोड़ा। नेहा के बयान के तुरंत बाद सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने एक संयुक्त पत्रकार वार्ता में कहा कि वे सत्ता परिवर्तन चाहते हैं और इसे हासिल करने के लिए लड़ाई लड़ेंगे। इस पत्रकार वार्ता में नेहा बोरा और वोट चोरी के मुद्दे पर आंदोलन कर रहे अन्य नेता भी मौजूद थे। हालांकि, प्रशांत भूषण ने बांग्लादेश या किसी अन्य पड़ोसी देश का उल्लेख नहीं किया, लेकिन भाजपा के प्रवक्ताओं ने उनके बयान को नेहा बोरा के बयान की अगली कड़ी मानते हुए विपक्ष पर अपना हमला और तेज कर दिया। इसके बाद सोशल मीडिया पर प्रशांत भूषण का वर्ष 2011 में वाराणसी में कश्मीर को लेकर दिया गया एक पुराना बयान भी वायरल हो गया। इसमें उन्होंने कहा था कि सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम हटाने और सेना की तैनाती धीरे-धीरे कम करने पर विचार होना चाहिए। यदि इसके बाद भी लोग अलग होने की इच्छा व्यक्त करें, तो जनमत संग्रह कराया जा सकता है। हालांकि, बाद में स्पष्टीकरण देते हुए उन्होंने कहा कि था कि उन्होंने कभी भी कश्मीर को भारत से अलग करने की बात नहीं कही थी। जहां भाजपा सत्ता परिवर्तन के मुद्दे पर अपना हमला तेज करती जा रही है और यह टीवी न्यूज चैनलों के प्राइम टाइम में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है, वहीं कांग्रेस ने नेहा बोरा के बयान से खुद को अलग करते हुए कहा कि बांग्लादेश या नेपाल में सत्ता परिवर्तन के समर्थन में पार्टी ने कभी अपना मत व्यक्त नहीं किया। लेकिन विपक्षी गठबंधन के एक प्रमुख घटक शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के नेता संजय राउत के एक नए बयान ने भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का एक और मौका दे दिया है। संजय राउत ने सोशल मीडिया पर अल्बानिया में भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच प्रदर्शनकारियों द्वारा सरकारी संस्थानों को निशाना बनाए जाने की घटना का उल्लेख किया और लिखा कि सभी देशों को इससे सबक लेना चाहिए, खासकर भारत को। भाजपा ने इस बयान पर ताजा हमला बोला ही था कि राउत ने एक पत्रकार के सत्ता परिवर्तन से जुड़े सवाल के जवाब में कहा कि राहुल गांधी वियतनाम गए हैं और उनके लौटने के बाद देखिए कि क्या होता है। भाजपा ने इसे अराजकता को बढ़ावा देने वाला बयान और भारत में भी बांग्लादेश जैसा सत्ता परिवर्तन लाने की मंशा का संकेत बताया। राउत की पार्टी की ही नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने बिना उनका नाम लिए उनके बयान से असहमति जताई और कहा कि वे किसी भी तरह के हिंसक प्रदर्शन के खिलाफ हैं। भाजपा जहां जोर-शोर से विपक्ष के सत्ता परिवर्तन संबंधी बयानों को लेकर देशव्यापी विमर्श खड़ा करने के अभियान में जुट गई है, वहीं विपक्ष इस मुद्दे पर रक्षात्मक दिखाई दे रहा है। इस समय उसका ज्यादातर वक्त अपने ही खेमे के नेताओं द्वारा सत्ता परिवर्तन पर दिए गए बयानों को लेकर सफाई देने में बीत रहा है। विपक्ष के लिए खतरा यह है कि यदि वह सत्ता परिवर्तन के मुद्दे पर भाजपा के हमलों का सही ढंग से जवाब नहीं दे पाया और पब्लिक परसेप्शन उसके खिलाफ चली गई, तो मतों की चोरी के मुद्दे पर सशक्त देशव्यापी आंदोलन खड़ा करने के उसके अभियान में वह धार नहीं रह पाएगी, जिसकी उसे उम्मीद है खासकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गुजरात, गोवा और कुछ अन्य राज्यों में जहाँ आगामी विधान सभा चुनाव होने हैं।