चौहान ने भाजपा नेतृत्व के दिल्ली जाने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। भाजपा के प्रदेश कार्यालय में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि वे मध्य प्रदेश छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। तत्कालीन कांग्रेस सरकार से कई मुद्दों पर टकराव के बाद चौहान जनता और भाजपा कार्यकर्ताओं से यही कहते थे कि टाइगर अभी जिंदा है। समय बदला। मार्च 2020 में कांग्रेस सरकार में फूट के बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल हुआ और भाजपा की सरकार बनी। चौहान एक बार फिर मुख्यमंत्री बने। समय फिर बदला। वर्ष 2023 के चुनाव में भाजपा की भारी बहुमत मिलने के बावजूद पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने चौहान की जगह उनके मंत्रिमंडल में उच्च शिक्षा मंत्री रहे मोहन यादव को मुख्यमंत्री चुना और चौहान को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दी। इस घटना के लगभग तीन वर्ष बाद चौहान का उसी सरकार के खिलाफ धरना पर बैठना पड़ा, जो उनके कट्टर समर्थकों के अनुसार, उनकी मेहनत से बनी थी। मामला उनके लोकसभा क्षेत्र विदिशा के कोथमी गांव का है, जहां लगभग दस आदिवासी परिवारों और पिछड़े समुदाय के दो परिवारों के मकानों को वन विकास निगम ने बुल्डोजर चलाकर गिरा दिया। इसके पीछे यह तर्क दिया गया कि ये परिवार वन विभाग की जमीन पर कब्जा करके रह रहे थे और उन्होंने उस जमीन पर खेती भी शुरू कर दी थी। धरना स्थल पर पत्रकारों से बात करते हुए चौहान इतने गुस्से में थे कि उन्होंने इस कार्रवाई को अंजाम देने वाले अधिकारियों को ‘जल्लाद’ तक कह दिया। उनकी नाराजगी की एक वजह यह भी थी कि अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया था कि इन परिवारों के खिलाफ ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। चौहान से कहा, यह जुल्म की पराकाष्ठा है, अन्याय की इंतिहा है। भाजपा को सत्ता करने की शक्ति इन पीड़ित परिवारों, विस्थापन और लोकसभा में हमें ही वोट देते हैं। ‘इन्हें’ के वोट से मोहन यादव जी मुख्यमंत्री बने हैं। यह भाजपा को रूरल करने का लाठियां है। चौहान ने यह भी कहा कि वे इस घटना से मुख्यमंत्री मोहन यादव को अवगत कराएंगे और उन्हें विश्वास है कि मुख्यमंत्री इस मामले में कड़ा कदम उठाएंगे। चौहान की नाराजगी केवल इस बार की कार्रवाई को लेकर नहीं है। उनका कहना है कि पिछले सात सौ अच्छे क्षेत्र में क्रूरों तरों की कार्रवाई की गई थी। चौहान के इस कदम और धरने पर बैठने से भाजपा की अंदरुनी राजनीति में उबाल आ गया है। सरकार में भी चिंता की लहर है। चौहान के दिल्ली जाने के बाद उनके पुत्र कार्तिकेय सिंह चौहान धरने पर बैठ गए हैं। उनका आरोप है कि छोटे बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। एक बच्ची को बाल पुरस्कार फेरक्का नया प्रधानमंत्री ने पत्रकारों के सवालों के जवाब में कहा कि वे जांच करवाएंगे और दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। वहीं, वन विभाग ने इस कार्रवाई को उचित ठहराया है। विभाग का कहना है कि जो भी कार्रवाई की गई, वह कानूनी तरीके से की गई और किसी के साथ भी ज्यादती नहीं हुई। देखना यह है कि जांच का नतीजा क्या निकलता है और जांच कौन करता है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, जो इस प्रदेश में 16 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे, उनकी सुनवाई भाजपा की अपनी ही सरकार में नहीं हो रही है? चौहान ने कहा कि उनकी बात सरकार के मुख्य सचिव और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष से हुई थी। उन्हें आश्वासन मिला था कि ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी, जिससे गरीबों का नुकसान ले। यदि चौहान की बात अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से पहले हुई थी, तो सवाल उठता है कि क्या मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने उनकी बात अनसुनी कर दी? क्या प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल भी सरकार से इस समस्या का समाधान नहीं करवा सके? सवाल यह भी है कि यदि मामला इतना गंभीर था, तो केंद्रीय कृषि मंत्री ने मुख्यमंत्री से सीधे बात क्यों नहीं की? क्या कृषि मंत्री और मुख्यमंत्री के बीच संबंध और सामान्य संबंध नहीं हैं? पिछले दिनों एक खबर छपी थी कि कृषि मंत्री ने प्रधानमंत्री कार्यालय से शिकायत की थी कि उन्हें प्रदेश सरकार के उस कार्यक्रमों में भी नहीं बुलाया जाता, जो उनके कार्यक्षेत्र यानी कृषि से संबंधित हैं।
मप्र में पहली बार: शिवराज चौहान का ‘अपनी ही सरकार’ के खिलाफ धरना-रंजन श्रीवास्तव
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