बांग्लादेश में चुनाव और भारत – संजय सक्सेना

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बांग्लादेश में नई और स्थाई सरकार के लिए मतदान संपन्न हुआ है। चुनाव के साथ ही यह तय हो गया है कि अब कुछ ही दिनों में जब भारत अपने रिश्तों को लेकर बांग्लादेश से संपर्क में होगा, तब उसकी बात मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार नहीं, अपितु एक स्थायी-चुनी हुई सरकार से होगी। नई सरकार बांग्लादेश का भविष्य तो तय करेगी ही, इसके साथ ही इसका भारत पर भी असर होने वाला है। शेख हसीना के प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद अब भारत के लिए अगली सरकार से चर्चा की रणनीति काफी अहम होने वाली है।

प्रश्न तो उठता ही है कि आखिर बांग्लादेश के चुनाव भारत के लिए कितने अहम हैं? किस तरह इस चुनाव के नतीजे दोनों देशों के रिश्तों को आगे प्रभावित कर सकते हैं? इसके अलावा इन चुनावों के मुद्दे क्या रहे हैं, जिनके आधार पर मतदाता नई सरकार चुनने जा रहे हैं? और, भारत को लेकर किस पार्टी का क्या रुख है?
1971 में बांग्लादेश की आजादी के बाद से ही दोनों देशों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव देखे गए हैं। सच्चाई तो यही है कि बांग्लादेश का अस्तित्व भारत के कारण ही है, क्योंकि भारत ने ही पाकिस्तान से अलग कर स्वतंत्र राष्ट्र बनने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। यही कारण है कि अधिकतर भारत-बांग्लादेश परस्पर सहयोगी रहे हैं। शेख हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश सरकार ने भारत के पूर्वोत्तर में फैले उग्रवाद को नियंत्रित करने में काफी सहयोग किया था। खासकर उल्फा और एनडीएफबी जैसे संगठन, जो कभी बांग्लादेश से सप्लाई होने वाले हथियारों के जरिए भारत में आतंकी घटनाओं को अंजाम देते थे, उनकी गतिविधियों को रोकने में सफलता हासिल हुई।

इस चुनाव में बांग्लादेश में मुख्य तौर पर चार पार्टियों के बीच मुकाबला है। हालांकि, इसमें अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना की आवामी लीग शामिल नहीं है। दरअसल, बीते साल जब हसीना के शासन के खिलाफ छात्र आंदोलन हिंसक हो गया तब वे बांग्लादेश छोडक़र भारत आने को मजबूर हो गईं। इसके बाद बांग्लादेश में बनी मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने कट्टरपंथी ताकतों के दबाव में न सिर्फ आवामी लीग को प्रतिबंधित कर दिया, बल्कि शेख हसीना के खिलाफ उनकी गैरमौजूदगी में कई केस भी चलवाए। इनमें से एक केस का फैसला इसी साल नवंबर में आया, जिसमें अपदस्थ पीएम को मौत की सजा सुनाई गई। चूंकि शेख हसीना भारत में हैं, इसलिए उन्हें सजा नहीं दी जा सकती। बांग्लादेश के चुनाव में यह भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है।

एक प्रमुख पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानि बीएनपी की नींव देश के प्रधानमंत्री रहे जिया-उर-रहमान ने की थी। बाद में उनकी पत्नी खालिदा जिया ने पार्टी के अलावा प्रधानमंत्री के रूप में कई वर्षों तक देश का भी नेतृत्व किया।
यह पार्टी 1979, 1991, 1996, 2001 में सत्ता हासिल करने में भी सफल हुई है। शेख हसीना के दौर में बीएनपी प्रमुख विपक्षी दल रहा। बीएनपी ने 2024 के आम चुनाव का बहिष्कार किया था। 30 दिसंबर 2025 को खालिदा जिया का निधन हो गया। इसके बाद से ही उनके बेटे तारिक रहमान पार्टी की कमान संभाल रहे हैं और उनकी देश में जोरदार वापसी हुई है।

जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश का सबसे बड़ा इस्लामिक दल है। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान जमात पर पाकिस्तान का साथ देने और बांग्ला भाषियों के साथ ही बर्बरता के आरोप लगे थे। यह पार्टी अधिकतर समय प्रतिबंध झेल रही थी। शेख हसीना के हटने के बाद 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इन पाबंदियों को हटाया, जिससे जमात का राजनीति में लौटने का रास्ता साफ हो गया। जमात-ए-इस्लामी की राजनीतिक ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसने सितंबर 2025 में ढाका यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनावों में जबरदस्त जीत हासिल की।
बांग्लादेश में नेशनल सिटीजन पार्टी यानि एनसीपी का उभार छात्र आंदोलन के चलते हुआ था। इसका गठन उन छात्रों की तरफ से किया गया है, जिन्होंने अगस्त 2024 में शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया था और उन्हें हटाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। इस पार्टी का नेतृत्व नाहिद इस्लाम जैसे छात्र नेता कर रहे हैं, जो कि यूनुस की अंतरिम सरकार में सलाहकार की भूमिका में भी रहे। इस पार्टी का फोकस वंशवादी राजनीति को खत्म करना और इसके लिए ढाचांगत बदलाव लाना है।

कुल मिलाकर अभी स्थिति बहुत साफ नहीं है कि सरकार किसकी बनेगी, लेकिन बांग्लादेश में जो भी सरकार बनेगी, हमारी विदेश नीति उसी के अनुसार तय होगी। साथ ही यह भी तय हो जाएगा कि हमारे संबंध कैसे होंगे? यदि कट्टरवादी ताकतें जीतती हैं, तो निश्चित तौर पर पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर हमारी चिंताएं बढ़ जाएंगी। बांग्लादेश की तरफ से कूटनीतिक सहयोग में किसी तरह का परिवर्तन भारत के उत्तर में स्थित क्षेत्र के लिए सुरक्षा का मुद्दा बन सकता है। हमें पाकिस्तान की तरफ से तो पहले से ही खतरा रहता आया है, बांग्लादेश से भी सावधान तो रहना ही होगा। हां, बीएनपी को बहुमत मिलता है, तो हो सकता है कि संबंध बेहतर हो जाएं।