केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का तीन दिवसीय छत्तीसगढ़ दौरा चर्चा में है। वे पहली बार छत्तीसगढ़ नहीं आए हैं। दिसम्बर 2023 में भाजपा की सरकार बनने के बाद उनका छत्तीसगढ़ आना अनवरत जारी है। शाह इस बार नक्सलवाद के मुद्दे पर उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक के अलावा बस्तर पंडुम के समापन समारोह में भी शामिल हुए। नक्सलवाद पर समीक्षा बैठक के दौरान उन्होंने एक बार फिर दोहराया कि 31 मार्च से पहले देश पूरी तरह नक्सलवाद से मुक्त हो जाएगा। वहीं, एक अन्य कार्यक्रम में उन्होंने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार पर निशाना साधा और कहा कि भूपेश बघेल की सरकार ने माओवादी संगठन को प्रश्रय दिया था। मैं समझ नहीं पाता हूं कि कैसे कोई शासन किसी हथियारबंद समूह को प्रश्रय दे सकता है। हालांकि कांग्रेस ने इसका तत्काल जवाब दिया और कहा कि शाह ने राजनीतिक विद्वेष के चलते गलत बयानबाजी की है। कांग्रेस संचार विभाग के प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने कहा भूपेश सरकार के दौरान शाह अपने सभी दौरों में नक्सली नियंत्रण पर राज्य सरकार की तारीफ किया करते थे। आंकड़ों में जाहिर है कि प्रदेश में कांग्रेस सरकार के दौरान नक्सली घटनाओं में कमी आई थी। खैर, यह राजनीतिक बयानबाजी हो सकती है। लेकिन आज नक्सलवाद अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है, इसमें कोई संदेह नहीं है। अब देखना होगा कि नियत तिथि तक राज्य नक्सलवाद से मुक्त होता है या नहीं। वैसे, शाह का छत्तीसगढ़ दौरा हमेशा ही चर्चा में रहा है। उनके इस दौरे के भी कई निहितार्थ हैं। तीन दिन का दौरा सिर्फ औपचारिकता नहीं हो सकता, इससे कहीं अधिक है। यह सरकार के साथ संगठन की राजनीतिक रणनीति को भी दर्शाता है। यह यात्रा न केवल नक्सलवाद और सुरक्षा से जुड़ी है बल्कि इसके जरिए सत्ता और संगठन को साधने की कोशिश भी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि छत्तीसगढ़ लंबे समय से नक्सलवाद का केंद्र रहा है। श्री शाह का लंबा प्रवास यह संकेत देता है कि केंद्र सरकार अब इस समस्या को केवल प्रबंधित नहीं बल्कि निर्णायक रूप से समाप्त करना चाहती है। यह संदेश भी अहम है कि भाजपा खुद को कठोर निर्णय लेने वाली पार्टी के रूप में पेश कर रही है, जबकि कांग्रेस के शासनकाल को वह ढुलमुल नीति से जोड़कर दिखाती रही है। उनका लगातार दौरा यह भी स्पष्ट करता है कि दिल्ली से रायपुर तक सत्ता की सीधी रेखा खींची जा रही है। राज्य सरकार को यह संकेत है कि केंद्र का भरोसा उसके साथ है, लेकिन साथ ही प्रदर्शन की कसौटी भी तय है। डबल इंजन सरकार का नारा अब केवल चुनावी जुमला नहीं, बल्कि जवाबदेही का ढांचा बनता दिख रहा है। इसके अलावा यह दौरा संगठनात्मक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। अमित शाह को भाजपा का सबसे कुशल रणनीतिकार माना जाता है। उनका छत्तीसगढ़ में समय देना यह बताता है कि पार्टी राज्य को दीर्घकालिक दृष्टि से देख रही है। बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करना, सामाजिक समीकरणों को साधना और भविष्य के चुनावों की नींव रखना। यह सभी यात्रा के गुप्त एजेंडे हो सकते हैं। वहीं, बस्तर पंडुम के बहाने आदिवासी इलाकों पर फोकस बेहद अहम है। बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्र कांग्रेस की पारंपरिक ताकत रहे हैं। भाजपा उसमें सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। यह दौरा आदिवासी समाज को यह संदेश देने का प्रयास है कि भाजपा केवल शहरी या मध्यमवर्गीय लोगों की पार्टी नहीं, बल्कि हाशिए पर रह रहे लोगों की भी पार्टी है। साथ ही शाह की सक्रियता कांग्रेस पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी बनाती है। संदेश साफ है कि भाजपा छत्तीसगढ़ को रणनीतिक राज्य मानती है और यहां विपक्ष को राजनीतिक जगह आसानी से नहीं देने वाली। लिहाजा, कांग्रेस के लिए यह दौरा एक चेतावनी है। ऐसे में कांग्रेस को यह समझना होगा कि केवल सरकार विरोधी बयानबाजी से काम नहीं चलेगा। उसे प्रदेश के मुद्दों पर ठोस विकल्प और विश्वसनीय नेतृत्व सामने रखना होगा। अन्यथा राजनीतिक जनाधार धीरे-धीरे सिकुड़ता जाएगा। बहरहाल, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का तीन दिवसीय दौरा एक साथ कई मोर्चों पर खेला गया राजनीतिक दांव है। सुरक्षा का भरोसा, सत्ता की पकड़ और संगठन की मजबूती यह बताती है कि छत्तीसगढ़ केवल क्षेत्रीय राजनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का अहम पड़ाव बन चुका है।
शाह का दौरा और राजनीतिक दांव-पेंच; संजीव वर्मा
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