राजिम। राजिम कुंभ कल्प मेला 2026 में साधु-संतों की साधना, वेशभूषा और तपस्या श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण और जिज्ञासा का केंद्र बनी हुई है। कुंभ मेला परिसर में कई ऐसे दृश्य देखने को मिल रहे हैं, जो श्रद्धालुओं को यह सोचने पर मजबूर कर रहे हैं कि साधना का मार्ग कितना कठिन और अनुशासित होता है।
कुंभ मेले में विभिन्न अखाड़ों के साधु-संतों का आगमन लगातार जारी है। अब तक 40 से अधिक संत-महात्मा राजिम पहुंच चुके हैं, जिनमें दशनाम जूना अखाड़ा और आवाहन अखाड़ा प्रमुख रूप से शामिल हैं। इसी क्रम में जूना अखाड़ा से पहुंचे महंत नीलगिरी महाराज श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।
महंत नीलगिरी महाराज 1100 रुद्राक्ष को दिनभर अपने सिर पर धारण करते हैं और केवल रात्रि विश्राम के समय ही उन्हें उतारते हैं। श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि रुद्राक्ष धारण करना उनकी भक्ति और साधना का अभिन्न हिस्सा है। भजन और साधना के दौरान वे निरंतर रुद्राक्ष धारण किए रहते हैं तथा रात्रि में विश्राम के समय ही उन्हें हटाते हैं। महंत नीलगिरी महाराज ने बताया कि विशेष धार्मिक अनुष्ठानों और कठिन साधना के समय रुद्राक्षों की संख्या बढ़ाई जाती है। उन्होंने इसे 12 वर्षों की तपस्या का प्रतिफल बताया। उन्होंने कहा कि वे राजिम कुंभ मेला में पहली बार आए हैं और मेला समापन तक यहीं प्रवास करेंगे।
कुंभ की परंपरा पर प्रकाश डालते हुए महंत नीलगिरी महाराज ने बताया कि देश में चार प्रमुख कुंभ नासिक, उज्जैन, प्रयाग और हरिद्वार में आयोजित होते हैं, जबकि राजिम को पांचवां कुंभ माना जाता है, जहां सनातन धर्म से जुड़े महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन संपन्न होते हैं। जब उनसे रुद्राक्षों के भार को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि उन्हें किसी प्रकार का भार महसूस नहीं होता, यह उनके गुरु की कृपा है। उन्होंने नागा साधुओं की दीक्षा परंपरा का उल्लेख करते हुए बताया कि 16 पिंडदान के पश्चात 17वां पिंडदान स्वयं का होता है, जिसके बाद साधक नागा साधु बनता है।
अखंड भक्ति का जीवंत उदाहरण : सिर पर 1100 रुद्राक्ष धारण कर तपस्या में लीन महंत नीलगिरी महाराज, बने श्रद्धा का केंद्र
