बारामती सीट का क्या इतिहास है और अजित पवार यहां कैसे लगातार चुनाव लड़ते हुए छा गए? अजित पवार निधन के बाद बारामती की विरासत कौन संभालेगा

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बारामती | महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बुधवार को एक विमान हादसे में निधन हो गया। इस घटना में चार अन्य लोगों की जान चली गई। अजित पवार के निधन के साथ ही अब महाराष्ट्र की राजनीति में एक शून्य पैदा हुआ है, जिसे आसानी से भरा नहीं जा सकता। खासकर उनके अपने विधानसभा क्षेत्र बारामती में, जहां अजित पवार साढ़े तीन दशक तक एकछत्र राज करते रहे। हालांकि, अब अजित पवार के निधन के बाद से ही उनकी विरासत संभालने पर चर्चाएं होने लगी हैं।
दरअसल, बारामती को पवार खानदान का गढ़ कहा जाता रहा है। इस विधानसभा सीट पर 1967 से शरद पवार अजेय रहे। 1991 में शरद के लोकसभा जाने के बाद अजित यहां से जीतते रहे। फिर चाहे उन्होंने चाचा शरद पवार के साथ चुनाव लड़ा हो या अपनी अलग पार्टी बनाने के बाद। आलम यह रहा कि इस सीट पर कोई भी अजित पवार को चुनौती नहीं दे पाया, फिर चाहे वह उनके ही परिवार का कोई और सदस्य क्यों न रहा हो।
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर बारामती सीट का क्या इतिहास है और अजित पवार यहां कैसे लगातार चुनाव लड़ते हुए छा गए? अजित पवार निधन के बाद बारामती की विरासत कौन संभालेगा? कौन-कौन उनकी विरासत संभालने का दावेदार माना जा रहा है? इन चेहरों का पारिवारिक और राजनीतिक इतिहास क्या है? .
बारामती विधानसभा क्षेत्र महाराष्ट्र की सबसे चर्चित और हाई-प्रोफाइल सीटों में से एक है। इसे मुख्य रूप से पवार परिवार के गढ़ के तौर पर जाना जाता है, जहां 1967 से इस परिवार का अटूट राजनीतिक दबदबा रहा है।
1. शुरुआती वर्ष (1952-1962)
1952: कांग्रेस के गुलाबराव मुलिक पहले विधायक चुने गए थे।
1957: चुनाव में पीडब्ल्यूपी के नानासाहेब जगताप ने जीत हासिल की।
1962: कांग्रेस की मालतीबाई शिरोले यहां से विधायक बनीं।

2. शरद पवार युग का उदय (1967-1991)
1967-1990: शरद पवार ने 1967 में पहली बार बारामती से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। बारामती को पवार परिवार का गढ़ बनाने में शरद पवार का अहम योगदान रहा और वे 1972, 1978, 1980, 1985 और 1990 में भी यहां से जीते। हालांकि, उनकी यह जीत तब कांग्रेस, कांग्रेस (यू) और भारतीय कांग्रेस (समाजवादी) के टिकट पर आई।
3. अजित पवार युग की शुरुआत (1991-1994)
1991: अजित पवार ने पहली बार उपचुनाव में इस सीट पर कब्जा किया और तब से वे लगातार यहां का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उन्होंने 1991, 1995, 1999, 2004, 2009, 2014, 2019 और 2024 के चुनावों में लगातार जीत हासिल की है। इन चुनावों में उन्होंने बड़े अंतर से जीत हासिल की है।

4. 2024 का ऐतिहासिक ‘पवार बनाम पवार’ मुकाबला
पारिवारिक विभाजन: 2023 में राकांपा में विभाजन के बाद, 2024 के विधानसभा चुनाव में पहली बार पवार परिवार के दो सदस्य आमने-सामने थे। अजित पवार (राकांपा) का मुकाबला उनके भतीजे युगेंद्र पवार (राकांपा-एसपी) से हुआ। अजीत ने 1,00,899 मतों के अंतर से जीत हासिल की।                                                                                                                                                                               बारामती में अजित की विरासत कौन संभाल सकताहै?
बारामती के मतदाताओं की एक पारंपरिक धारणा रही है लोकसभा के लिए ताई (सुप्रिया सुले) और विधानसभा के लिए दादा (अजीत पवार)। दरअसल, जिस तरह विधासनभा चुनावों में अजित पवार ने बारामती से दम दिखाया है, कुछ वैसा ही काम सुप्रिया सुले ने यहां संसदीय क्षेत्र से किया है। यहां तक कि राकांपा के दो टुकड़े होने के बाद भी, जब 2024 में अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार इस सीट से उनके खिलाफ मुकाबले में थीं, तब भी सुप्रिया सुले ने यहां से जीत हासिल की। सुप्रिया सुले 2009, 2014, 2019 और फिर 2024 में भी यहां से सांसद हैं।

ऐसे में माना जा रहा है कि सुप्रिया सुले फिलहाल अपनी संसदीय सीट कायम रखेंगी। हालांकि, अजित पवार की बारामती की विरासत संभालने के लिए अभी भी कई नाम आगे हैं। इनमें उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार से लेकर उनके दो बेटे और अजित पवार के भतीजे तक शामिल हैं।
1. सुनेत्रा पवार
अजित पवार की पत्नी और राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार को बारामती में अपने पति की विरासत संभालने का बड़ा दावेदार माना जा रहा है। सुनेत्रा अभी राज्यसभा सांसद हैं और बारामती टेक्सटाइल कंपनी की अध्यक्ष भी हैं। वे इससे पहले बारामती लोकसभा सीट से चुनाव लड़ चुकी हैं और सुप्रिया सुले के 51% वोटों के मुकाबले 40% वोट जुटा चुकी हैं।

2. पार्थ पवार
अजित पवार के बड़े बेटे पार्थ को भी उनके संभावित उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, राजनीति में वह काफी समय तक सक्रिय नहीं रहे। पार्थ पवार आमतौर पर पिता की तरह जमीन पर उतरते और राजनीतिक प्रचार करते नहीं दिखे हैं। हालांकि, 2025 में पुणे के मुंधवा जमीन सौदे को लेकर भी उनका नाम चर्चा में आया था। उन्होंने 2019 में मावल निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ा था, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा। अब उन्हें अजित पवार के समर्थकों के लिए एक युवा और स्थायी चेहरे के रूप में पेश किया जा सकता है।
3. जय पवार
अजित पवार के छोटे बेटे जय पवार अब तक राजनीति में नहीं उतरे हैं। अगर वे चुनावी मैदान में उतरते हैं, तो वे पवार परिवार के सातवें सदस्य होंगे जो सक्रिय चुनावी राजनीति का हिस्सा होंगे। जय पवार भले ही अब तक राजनीति में नहीं उतरे हैं, लेकिन अजित पवार ने कुछ समय पहले खुद संकेत दिया था कि अगर कार्यकर्ताओं और जनता की इच्छा हो, तो जय पवार उनकी पारंपरिक बारामती विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। हाल के समय में जय ने बारामती के ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा करना और ग्रामीणों के साथ बातचीत करना शुरू कर दिया है। इसे राजनीतिक हलकों में उनके ‘सॉफ्ट-लॉन्च’ (राजनीति में प्रवेश की शुरुआत) के रूप में देखा जा रहा है।
4. रोहित पवार
शरद पवार के पोते और अजित पवार के भतीजे रोहित पवार को भी पवार परिवार के उभरते सितारे के रूप में देखा जाता है। वे शरद पवार के सबसे बड़े भाई दिनकरराव (अप्पासाहेब) पवार के पोते और राजेंद्र पवार के बेटे हैं। रोहित पवार ने 2019 के बाद 2024 के विधानसभा चुनाव में अहमदनगर जिले की कर्जत-जामखेड सीट से जीत हासिल की थी। शरद पवार खुद रोहित को भविष्य की नेतृत्वकारी भूमिका के लिए तैयार किया है। रोहित पवार ने खुद कभी बारामती में चुनाव लड़ने को लेकर कोई संकेत नहीं दिया है। हालांकि, 2024 के चुनाव में कर्जत-जामखेड सीट पर उनकी जीत का अंतर कुछ हजार वोट ही था, जिस पर अजित पवार ने उनकी चुटकी भी ली थी। ऐसे में राकांपा (एसपी) आने वाले समय में रोहित को अपने परिवार की मजबूत सीट बारामती से लाकर इस गढ़ को और मजबूत कर सकती है।
5. युगेंद्र पवार (शरद पवार गुट के मजबूत दावेदार)
पवार परिवार में अंदरूनी टकराव का इतिहास लंबा है। हालांकि, चुनाव में इस परिवार के सदस्य गिने-चुने मौकों पर ही आमने-सामने रहे हैं। पहला मौका सुप्रिया सुले और सुनेत्रा पवार का मुकाबला था। वहीं, दूसरा मौका 2024 में ही आया, जब अजित पवार को बारामती सीट पर उनके भतीजे युगेंद्र ने चुनौती दे दी। युगेंद्र पवार ने बारामती से अजित पवार के खिलाफ चुनाव लड़ा, हालांकि उन्हें यहां एक लाख से ज्यादा वोटों से हार मिली थी। इसके बावजूद वे बीते कुछ चुनावों में अजित पवार के खिलाफ सबसे ज्यादा वोट (29 फीसदी) जुटाने वाले नेता बने। जब युगेंद्र पवार ने 2024 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार किया तो बारामती के कार्यकर्ताओं के बीच वे नवा दादा (नए दादा) के नाम से लोकप्रिय हुए। उन्हें यहां अजित पवार (जिन्हें दादा कहा जाता है) की राजनीतिक विरासत के विकल्प के रूप में देखा जाता है। ऐसे में अटकलें लगने लगीं कि अजित पवार की काट ढूंढने के लिए शरद पवार खुद उन्हें तैयार कर रहे हैं।