कहां बात करना अनुचित होता है? – डॉ.माणिक विश्वकर्मा

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आज का मानव इतना बातूनी हो गया है कि उसे इस बात का ध्यान ही नहीं रहता कि कहाँ बात करना चाहिए और कहाँ नहीं। भारतीय धर्म एवं संस्कृति के अनुसार अनेक स्थानों जैसे मंदिर, पूजा स्थल, सत्संग, कथा-कीर्तन, आरती, योगा व ध्यान के समय, श्मशान घाट, चिकित्सालय में रोगग्रस्त गंभीर मरीज़ के पास तथा भोजन करते समय अनावश्यक बात करने को अनुचित माना गया है। इसके अलावा बहुत से स्थानों में यथा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में किसी के उद्बोधन के दौरान, काव्य पाठ, गायन और संचालन के दौरान बात करने को अशिष्टता माना जाता है। लेकिन अक्सर ऐसे स्थानों में लोगों को खूब बात करते हुए आसानी से देखा जा सकता है। इस तरह की हरकतें प्राय: वे लोग किया करते हैं जिन्हें या तो संस्कार विरासत में न मिला हो या जो स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानते हों या जिनका अवसर, अनुष्ठान,हो रहे कार्यक्रम या क्रियाकर्म से कोई वास्ता नहीं होता। श्मशान में बैठकर इधर-उधर की बातें करना, प्रभुत्व वाले लोगों के आसपास मँडराना, घडिय़ाली आँसू बहाना, मृतात्मा से संबंधों का हवाला देकर स्वयं को महिमा मंडित करना अशोभनीय एवं निंदनीय माना जाता है। कथा -कीर्तन ,पूजा पाठ एवं आरती के दौरान गप्प मारना, ताकझांक करना एवं विलंब से सिफऱ् प्रसाद प्राप्त करने के उद्देश्य से जाना ठीक नहीं माना जाता। अक्सर साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अतिथि के रूप में मंचासीन तथाकथित श्रेष्ठजनों को किसी के संचालन, उद्बोधन एवं प्रस्तुति के दौरान कानाफूसी करते हुए लोगों की भावभंगिमा को देखकर ऐसे लगता है मानों उनके गले में अचानक कोई फाँस अटक गई हो। स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने के लिए भी कुछ लोग इस तरह की हरकतें किया करते हैं। चिकित्सालय में गंभीर रूप से पड़े रोगी को सान्त्वना देने के बजाय ये कहना कि आपने तो हमें बताया नहीं जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर उनसे अनावश्यक बातें करना शिष्टाचार की श्रेणी में नहीं आता। किसी भी क्षेत्र में अनावश्यक अधिक बातें करने से समय एवं उर्जा की बर्बादी के साथ ही स्वयं की छवि भी खराब होती है।रिश्तों में खटास आने की संभावना बढ़ जाती है। कम एवं संतुलित विचार स्पष्ट एवं प्रभावशाली होते हैं। कम शब्दों में अधिक बातें वही लोग बोल पाते हैं जिन्हें विषय की पर्याप्त जानकारी होती है। कहा भी गया है कि थोथा चना बाजे घना। शांत और गहरे शीतल जल की तरह मौन रहने से मानसिक शांति मिलती है, निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है एवं प्रचूर मात्रा में उर्जा का संचय होता है। जहाँ आवश्यक हो वहीं सोच- समझकर अपनी बात रखना चाहिए। अपना समय आने का इंतजार करना चाहिए। हर बात पर प्रतिक्रिया देने और अपनी राय थोपने से दोस्त कम दुश्मन अधिक पैदा होने लगते हैं।भगवद्गीता में वाणी के संदर्भ में कहा गया है कि-अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ यानी जो वाणी किसी को मानसिक कष्ट न पहुँचाए, जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो, तथा जो नियमित अध्ययन की देन हो, उसे वाणी की तपस्या कहा जाता है। इसी तरह मनुस्मृति में कहा गया है कि सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् अर्थात सत्य बोलो, प्रिय बोलो, लेकिन अप्रिय सत्य या प्रिय असत्य न बोलो।अधिक बातें करने से होने वाले नुकसान के संदर्भ में पंचतंत्र में कहा गया है कि-आत्मनो मुखदोषेण बध्यन्ते शुकसारिका: बकास्तत्र न बध्यन्ते मौनं सर्वार्थसाधनम् अर्थात तोता और मैना अपनी मधुर आवाज की वजह से पिंजरे में बंध जाते हैं पर बगुला ऐसे बंधता नहीं क्यों कि वह बोलता नहीं मौन ही सर्व अर्थ सिद्ध करने का साधन है। संस्कृत में कहा गया है कि -उत्तमो नातिवक्ता स्यात् अधमो बहु भाषते।स काञ्चने ध्वनि: तादृक् यादृक् कांस्ये प्रजायते।। मसलन श्रेष्ठ व्यक्ति बहुत ज्यादा नहीं बोलता जबकि अधम व्यक्ति बहुत अधिक वाचाल होता है जैसे सोने के टकराने पर वैसी ध्वनि नहीं होती, जैसी कांसे के टकराने से होती है।अत: जीवन में सदैव कम बोलें, सत्य बोलें और जहाँ आवश्यक हो वहीं बोलें।