31 मार्च 2026… देश नक्सलवाद से मुक्त। केंद्र और राज्य सरकारों की दृढ़ इच्छाशक्ति, केंद्रीय बलों, राज्य पुलिस और स्थानीय जनता के सहयोग से छत्तीसगढ़ सहित देश के 12 राज्यों से सशस्त्र नक्सलवाद खत्म हो गया है। बकायदा केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने सोमवार को लोकसभा में “नक्सल मुक्त भारत” के मुद्दे पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए ऐलान किया कि देश में नक्सलवाद खत्म होने की कगार पर है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब हथियार उठाने वालों को उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। अन्याय का समाधान संविधान में है, हथियार में नहीं। यहां यह बताना लाजिमी है कि केंद्रीय गृह मंत्री ने 24 अगस्त 2024 को राजधानी रायपुर में पहली बार कहा था कि 31 मार्च 2026 तक पूरा देश नक्सलवाद से मुक्त हो जाएगा। जब उन्होंने यह बात कही थी तो असंभव लगता था, लेकिन यह संभव हो चुका है। छत्तीसगढ़ सहित पूरा देश लाल आतंक से मुक्त हो चुका है। हालांकि कुछ बड़े नेता अभी भी पकड़ से बाहर हैं, लेकिन देर-सबेर वे गिरफ्त में होंगे। 1970 के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ नक्सलवाद का दंश धीरे-धीरे देश के कई राज्यों में फैल गया। छत्तीसगढ़ इससे सर्वाधिक प्रभावित रहा। बस्तर संभाग के अंदरूनी क्षेत्रों में नक्सली समानांतर सरकार चलाने लगे थे, लेकिन पिछले दो सालों में जिस तरह से केंद्र और राज्य के करीब 72 हजार जवान बस्तर में डेरा डालकर नक्सलियों की मांद में घुसकर उन्हें मारने लगे इससे अंदाजा लग गया था कि नक्सलियों के दिन लद गए हैं। पिछले साल 18 नवंबर को छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े नक्सली नेता हिड़मा की मौत के बाद तो तय हो गया कि नक्सलवाद को खत्म करने में अब ज्यादा समय नहीं लगेगा। अब तक राज्य में 535 नक्सली मारे जा चुके हैं, जबकि 2898 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। सभी बड़े कैडर या तो आत्मसमर्पण कर चुके हैं या मारे जा चुके हैं। लेकिन अब एक बड़ी चुनौती उन क्षेत्रों के विकास की है, जहां दशकों तक नक्सलियों की जंजीरों ने उन्हें जकड़ रखा था। क्षेत्र में सामाजिक- आर्थिक असमानता और उपेक्षा को दूर करने के साथ ही भूमि अधिकार, जल-जंगल-जमीन की उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करना होगा। साथ ही सड़क, संचार, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के विस्तार पर भी जोर देना होगा। केंद्रीय गृह मंत्री के वक्तव्य में इसका उल्लेख तो है ,लेकिन इसके क्रियान्वयन के लिए लगातार निगरानी की आवश्यकता है। इसके अलावा आत्मसमर्पित नक्सलियों के पुनर्वास को भी प्राथमिकता में शामिल करना होगा। बहरहाल, नक्सल मुक्त भारत का लक्ष्य हासिल करना केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और समावेशी विकास के साथ सतत प्रयास, पारदर्शिता और स्थानीय समुदायों के विश्वास का परिणाम है। देश के साथ जल-जंगल और जनजाति संस्कृति के लिए मशहूर हमारा बस्तर भी नक्सलियों के चंगुल से मुक्त होकर अब शांति की ओर लौट रहा है। बस्तर में अब महुए की मादक खुशबू और मांदर की थाप गूंजने लगी हैं। यह लोकतंत्र की जीत है। इस अभियान में कई जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी हैं, उन्हें नमन…!
लोकतंत्र की जीत – संजीव वर्मा
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