महाशिवरात्रि विशेष यात्रा कथा : शिव-उमा निवास

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कैलाश पर्वत-मानसरोवर 

महाशिवरात्रि के महापर्व में दुनिया के सबसे बड़े शिवधाम” कैलाश पर्वत- कैलाश मानसरोवर” की यात्रा का स्मरण रोमांचित करता है।हिमालय के उत्तर दिशा में तिब्बत चीन देश के अधीन यह स्थित है। विदेश मंत्रालय से अनुमति उपरांत ही यात्रा की जाती है।

सदैव बर्फ से आच्छादित कैलाश पर्वत समुद्र सतह से 22028 फीट ऊॅचा है, जिसके शीर्षचोटी की आकृति विराट शिवलिंग की तरह है। कैलाश पर्वत की चारों दिशाओं से एशिया की चार बड़ी नदियाॅ ब्रम्हपुत्र, सिन्धु, सतलज और करनाली का उद्गम हुआ है।

ऐसे दुर्गम और विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल को देखने-जानने हेतु हमारी यात्रा दुर्ग-नवतनवा एक्सप्रेस से शुरू हुई। नवतनवा (यूपी-नेपाल बार्डर) तक ट्रेन से एवं वहाॅ से काठमांडू (नेपाल) तक की यात्रा हमने बस में पूरी की। काठमांडू (धूलिखेल) में भगवान पशुपतिनाथ, मनोकामना देवी एवं बूढ़ा नीलकंठ के दर्शन का लाभ मिला। रात्रि विश्राम के उपरांत काठमांडू से चीन सीमा तक की यात्रा बस के द्वारा हमने पूरी की। रास्ते भर बड़ी बड़ी नदियां, पहाड़, खाई, जंगल को पार करना बड़ा जोखिम भरा रहा। ऐसे खतरों को पार करते हुये नेपाल सीमा से चीन की धरा में जा पहुंचे। चीन बार्डर पर हमारे सामान एवं पासपोर्ट की बड़ी सूक्ष्मतापूर्वक जाॅच की गई। वहाॅ से आगे की हमारी यात्रा ‘‘लेण्डक्रुर्जर‘‘ (जीप जैसी चार सीटर मजबूत गाड़ी) से आरंभ हुई।

खाना कम पानी अधिक
हमारा पहला पड़ाव ‘‘नायलम‘‘ (12792 फीट ऊॅचाई) रहा। वहाॅ का वातावरण बर्फीली हवाओं से घिरे होने के कारण कपकपा देने वाला था। यहाॅ पर दो दिन रूकवाया गया, ताकि नये वातावरण के अनुकूल हम शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हो सकें। साथ ही ऊॅचे पहाड़ पर चढ़ने (ट्रेकिंग) की ट्रेनिंग दी गई, जिससे श्वांस लेने एवं छोड़ने में हमें आ रही कठिनाईयों का ज्ञान हो सके। अगली सुबह हम अपने दूसरे पड़ाव ‘‘न्यू डोंगबा‘‘ के लिये रवाना हुये, जो कि ‘‘नायलम’’ से 450 किलोमीटर दूर था। समुद्र तल से 14890 फीट ऊॅचाई पर स्थित ‘‘न्यू डोंगबा‘‘ का वातवरण सर्द हवाओं की मार और प्राणवायु आक्सीजन की हल्की कमी का एहसास कराने लगा था। यहाॅ रात्रि के समय हमें खाने में खिचड़ी के साथ यह भी सलाह दी गई कि खाना कम और पानी का सेवन अधिक करें ताकि पानी में घुली आक्सीजन शरीर को प्राप्त हो सके।

हड्डियां कंपाने वाली ठंड
तीसरे दिन की सुबह हमें अगले पड़ाव के रास्ते में ब्रम्हपुत्र नदी मिली। उस निर्जन मरूभूमि (हरियाली विहिन) में चार-पाॅच घण्टा की यात्रा को पूरा करके हम कैलाश मानसरोवर झील के करीब जा पहुंचे। यह झील समुद्र सतह से 17000 फीट ऊॅचाई पर स्थित है। ऐसी झील दुनिया में और कहीं नहीं है। हिन्दू वेदग्रन्थों के मुताबिक मानसरोवर झील की उत्पत्ति भगवान ब्रम्हा के मन से हुई। मानसरोवर संस्कृत के मानस (मस्तिष्क) और सरोवर (झील) शब्द से बना है। जिसका अर्थ होता है मन का सरोवर। हिन्दू पुराण में इसका नाम ‘‘क्षीर सागर’’ है।

मानसरोवर झील के तट से कैलाश पर्वत के भी दर्शन होने लगे। यह सब देखकर मनमयूर नांच उठा। पूरी थकान और सिर का भारीपन कपूर की भाॅति हवा में विलीन हो गया। हड्डियों को कंपकपा देने वाली वहाॅ की ठण्ड को भूलकर हम बम बम भोले कहते कैलाश मानसरोवर में डूबकी लगाने उतर गये। झील के बर्फीले पानी में ज्यादा देर तक रहना असहनीय था, अतः जल्दी से डुबकी लगाकर अपने मोटे गर्म कपड़ों को हमने शरीर पर लाद लिया।

राक्षस ताल चौंका गया
मानसरोवर मे स्नान करने के बाद हमने आगे की यात्रा शुरू की। रास्ते मे हमें एक और ताल देखने को मिला जिसका नाम ‘‘राक्षस ताल’’ है। ऐसी मान्यता है कि रावण यहाॅ पर भगवान भोलेनाथ की तपस्या करता था। रावण की इस तपस्या के कारण वहाॅ की जमीन धसक गई है और उसमें राक्षस ताल बन गया है। इस ताल का पानी खारा है और इसमें कोई स्नान नहीं करता। यहाॅ से आगे जाने के बाद हमें मानसरोवर झील के करीब ‘‘चियूगोमपा’’ नामक जगह में रात्रि में रूकवाया गया।
‘‘चियूगोमपा’’ में एक विचित्र बात देखने को मिली। ठिठुरा देने वाली ठण्ड के माहौल में भी वहाॅ गर्म जल धारा का एक स़्त्रोत हमें मिला। उसके गर्म पानी से नहाने का हमने भरपूर आनंद लिया। इसके बाद हम अपने यात्रा के अगले पड़ाव ‘‘डारचेन’’ नामक जगह में पहुंचें। यहाॅ से कैलाश पर्वत के 42 किलोमीटर क्षेत्र की परिक्रमा हमें तीन दिन में पूरी करनी थी। हमारे अनेक बुजुर्ग और आंशिक बीमार साथी परिक्रमा करने में असमर्थ थे अतः वे डारचेन में ही कच्चे मकानों में ठहर गये। शेष यात्री परिक्रमा के लिये निकल पड़े। हमारे अधिकांश साथियों ने घोड़े पर बैठकर परिक्रमा करने का निर्णय लिया, किन्तु अपने कुछ साथियों के साथ हमने पैदल ही परिक्रमा करने का साहस दिखाया।

मडहाउस में रात्रि विश्राम
सबले पहले हम ‘‘यम द्वार’’ नामक स्थान पर पहंचे। यहां पर नये पुराने कपड़े छोड़ने का रिवाज का पालन कर हमने कुशलतापूर्वक कैलाश पर्वत की परिक्रमा पूरी करने की याचना की। इसके बाद उबड़ खाबड़ बियाबान पहाड़ों पर बनी पगडंडियों से हम आगे बढ़े। हाथ में छड़ी और छोटे से बैग में रखे पानी की बोतल, दवाई और कुछ ड्राई फु्रट्स ही हमारे पास थे जो हमारा हौसला बढ़ा रहे थे। यहाॅ पहाड़ों पर नाम मात्र को छोटे छोटे घास ही थे, दूर दूर तक पशु-पक्षी पेड़-पौधे नजर नहीं आते थे। यही वजह है कि कैलाश पर्वत को मरूभूमि भी कहा जाता है।
कहीं कही थोड़ी बहुत घास और जंगली झाड़ी दिखाई देती थी जिसे स्थानीय जानवर ‘‘याक’’ चरते दिखाई देते थे। याकों के ही बूते ही यहाॅ सामानों की ढुलाई की जाती है। यह सब देखते-देखते परिक्रमा के पहिले दिन के दस किलोमीटर का सफर तय कर हम अपने पड़ाव ‘‘डेरा पुक’’ नामक जगह में पहुंच गये। यह स्थल कैलाश पति के बिल्कुल ही करीब था। वहाॅ पर कच्चे मकानों में हमें रात्रि में ठहराया गया। चांदनी रात थी। चंद्रमा के प्रकाश से कैलाशपति पर जमे श्वेत धवल बर्फ अलौकिक किरणे बिखेर रहे थे।

गौरी कुण्ड में जन्मे गणेश
हमारे खाने पीने की व्यवस्था टूर आपरेटर के कर्मचारी ‘‘सेरपा’’ (नेपाली युवा) कर रहे थे। सुबह पांच बजे उन्होंने हमें गर्म पानी, चाय, नाश्ता उपलब्ध करा दिया, जिसे ग्रहण कर हमारे परिक्रमा के दूसरे चरण की शुरूआत हुई। हमेे दिनभर में 22 किलोमीटर के चढ़ाव उतार वाले खतरनाक बर्फीले रास्ते ‘‘डोलमाला पास’’ (परिक्रमा मार्ग की सबसे ऊंची चोटी ) को पूरा करना था, जो कि समुद्र सतह से 19024 फीट ऊचांई पर स्थित है। इसी रास्ते में हमें ‘गौरी कुंड’’ के भी दर्शन हुये। कहा जाता है कि यहीं पर भगवान शिव को प्राप्त करने के लिये माता पार्वती ने घोर तपस्या की थी। इसी कुण्ड में स्नान करते-करते अपने शरीर के उबटन सेे गणपति की मूर्ति बनाई और यहीं पर गणपति जी का जन्म हुआ। इस कुंड का पानी बहुमूल्य धातु हरे पन्ना के जैसे चमकता रहता है।

‘‘गौरी कुंड‘‘ के जल को आसानी से प्राप्त नही किया जा सकता, क्योंकि बहुत गहराई में खतरनाक चटटान से उतरना चढ़ना पड़ता है, पर हमारे साथ चल रहे सेरपा ने हमारे निवेदन पर जल लाकर दिया। दुर्लभ जल पाने की खुशी में झूमते-झूमते हम लोग अपने पड़ाव ‘‘झुटुलपुक’’ पहुंच गये। रास्ते मे कई जगह बर्फ में चलते-चलते फिसलने के डर के साथ-साथ पहली बार बर्फ में चलने का मजा भी मिला।उस दिन की यात्रा दुर्गम, भयावह और भारी थकान भरी थी। हमारे हाथ पाॅव फूल रहे थे। सरसो तेल से मालिश कर स्वयं को हमने अगले दिन की परिक्रमा के लिये तैयार किया।

दूसरे दिन फिर हम लोग अल सुबह ही परिक्रमा के लिये रवाना हो गये। 10 किलोमीटर के आखिरी दिन की परिक्रमा को पूरा करके हम वापिस ‘‘डारचिन’’ पहुंच गये। जहाॅ हमारे साथ के ऐसे बुजुर्ग साथी जो लोग हमारे साथ परिक्रमा के लिये नहीं गये थे, उन्होंने जोश खरोश के साथ ओम नमः शिवाय का उद्घोष करके हमारा स्वागत किया। परिक्रमा पूरी करने के उपरांत हमने फिर केैलाश मानसरोवर में स्नान किया, तथा तट पर हवन और भजन आरती करके भोलेनाथ से विदा ली। विदाई के बेला में हमारी आंखे नम थी। कैलाश पर्वत को निहारते-निहारते धीरे-धीरे वापिस अपने देश, अपने शहर अपने घर सुरक्षित पहुंच गये।

इस यात्रा को पूरी करने में हमें कुल 16 (18 जुलाई से 03 अगस्त) दिन लगे थे। कैलाश पर्वत-मानसरोवर की यात्रा कठिन जरूर है, पर असंभव नहीं। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा भी इस यात्रा को प्रोत्साहित करने के लिए प्रत्येक यात्री को 25000 की सम्मान निधि(तब की निर्धारित राशि)प्रदान की जाती थी। हमें भी यह सुखद अवसर प्राप्त हुआ। बम बम भोले।

विजय मिश्रा‘अमित’ पूर्वअति.महाप्रबंधक(जन)
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मोबा- 98931 2331