आदिम जनजाति बाहुल्य राज्य छत्तीसगढ़ भारत का हृदय प्रांत है। अनादि काल से धार्मिक – सांस्कृतिक- राजनीतिक – समृद्धि के लिए इसे जाना जाता है। कलम- किला और कला सहित विविध प्राचीन खेलों का यह गढ़ भी है। ऐसे ही प्राचीन और अत्याधुनिक खेल आम जनमन के भीतर नव ऊर्जा का संचार करते हैं। तभी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी कहते हैं कि खेलोगे नहीं तो खिलोगे कैसे। उन्होंने अपने मन की बात में स्कूली विद्यार्थियों से पूछा था – पसीना किनको किनको आता है? उत्तर यही था कि आजकल के बच्चों को पसीना नहीं आता। इसका एकमात्र कारण यही है कि अब शारीरिक श्रम करने की प्रवृत्ति लगातार कम हो रही है। फलस्वरूप शारीरिक- मानसिक- पारिवारिक संकटों से मानव समाज घिरता जा रहा है। तरह-तरह की व्याधियों का घर मानव देह बनता जा रहा है। संसार सेहतमंद बना रहे इसके लिए खेलना ही शारीरिक श्रम और मनोरंजन का एक बड़ा माध्यम है। खेलों की घटती लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए अथवा खेलों से बढ़ती हुई दूरी को पाटने के लिए खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स की एक अच्छी शुरुआत मेजबान छत्तीसगढ़ से हुई। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर सहित सरगुजा और बस्तर में आयोजित खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में देश भर के आदिम जनजाति समुदाय के हजारों यूवा खिलाडिय़ों ने बढ़ चढ़कर भागीदारी दी। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इसे सुदूर अंचलों में छुपी हुई प्रतिभाओं की खोज, आत्मविश्वास और आपसी तालमेल बढ़ाने की दृष्टि से ऐतिहासिक पहल निरूपित किया। यद्यपि खेल के पहले ही दिन उद्घाटन समारोह रायपुर खेल मैदान में महाखेला या कहें गेम में ही ब्लंडर गेम हो गया था। चर्चा यही रही कि वेजफूड से पनीर गायब रहा, उसकी जगह आलू छाया रहा। उसी तरह नानवेज चिकन में ‘लेग पीसÓ गायब रहा ‘नेक पीसÓ छाया रहा। नायक- नायिका खिलाडिय़ों के अलावा व्यवस्था में लगे रहे अन्य ‘मेहनतकश हीरोÓ भी खाने-दाने को भटकते फिरते नजर आए। प्रिंट इलेक्ट्रानिक मीडिया ने खेल के इस गंदे खेल को भरपूर उजागर करके शासन प्रशासन को आंख खोलने के लिए प्रेरित किया। फलस्वरुप दूसरे ही दिन कलमकारों और खिलाडिय़ों के आदर सत्कार स्तर में सुधार हुआ। खिलाड़ी शांत हो गये जी जान से खेलने में जूट गए और कलमकारों की कलम भी बढिय़ा चलने लगी। बचपन से सुनते पढ़ते आए हैं कि खेल भावना ही व्यक्ति को हर अनुकूल- प्रतिकूल परिस्थितियों के अनुरूप ढलने के लिए प्रेरित करती है। भारतीय जनता और छत्तीसगढ़ के लोग ऐसे ही खिलाड़ी हैं, जो हर हाल में जीना जानते हैं और मजे की बात होती है जिनके हाथ में ऐसे आयोजन की बागडोर होती है, वे लोग खिलाडिय़ों को खूब खेलना तो कहते हैं, पर खूब खाना कहने में कंजूसी करते हैं। बेचारे ईमानदार खिलाड़ी खाना भूल कर खेल पर ध्यान केंद्रित करते हैं और खिलाडिय़ों की ऐसी प्रवृत्ति का फायदा अधिकांश इवेंट मैनेजर कांट्रेक्टर खूब उठाते हैं। वे खिलाडिय़ों को मंत्र सिखाते हैं खेलोगे नहीं तो खिलोगे कैसे? लेकिन खुद मंत्र पढ़ते रहते हैं सरकारी माल खाओगे नहीं, नेता, मंत्री, साहबों को खिलाओगे नहीं तो खिलोगे कैसे? खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में घोषणा कि प्रतिवर्ष इसका आयोजन छत्तीसगढ़ में ही होगा। बात कुछ अटपटी सी लगी। क्या बाकी दिगर राज्य ऐसे आयोजन के लिए कमजोर हैं? हरगिज नहीं, अत: सभी सक्षम राज्यों को वर्षवार अवसर देना बेहतर होगा। अनेक दृष्टि से यही फायदेमंद भी होगा। जो राज्य पदक तालिका विजेताओं की सूची में प्रथम, द्वितीय, तृतीय है उन्हें अवसर देने से अन्य राज्यों के खिलाडिय़ों को भी वहां का खेल माहौल देखने का सुअवसर प्राप्त होगा। अकेले छत्तीसगढ़ पर बोझ भी नहीं आएगा। छत्तीसगढ़ के विजयी खिलाडिय़ों को व्यक्तिगत स्पर्धा में अधिक तथा दलीय स्पर्धाओं में कम नगद राशि देने की भी घोषणा की गई है, जो कि तर्कसंगत नहीं लगता है। होना यही चाहिए था कि व्यक्तिगत पुरस्कारों में कम तथा दलीय स्पर्धाआओं में अधिक पुरस्कार राशि रखना उचित होता। खेल महोत्सव की बात में यह भी कहना होगा कि आज भी छत्तीसगढ़ के अनेक गांव- शहरों के स्कूल -कॉलेज खेल मैदान, खिलाड़ी, और खेल प्रशिक्षकों के लिए तरस रहे हैं। खिलाडिय़ों के परिवार निर्धन हैं, होनहार खिलाड़ी समुचित साधनों के अभाव में पीछे छूटते नजर आ रहे हैं। प्रदेश के बीपीएड डिग्रीधारी युवा नौकरी पाने के लिए भटक रहे हैं। खेल अधिकारियों के पद रिक्त पड़े हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ के खेल जगत को बढ़ावा देने कुछ कांक्रीट घोषणा की दरकार सरकार से है। अन्यथा डर है कि ट्राईबल गेम्स आया राम गया राम न हो जाए। समय रहते इस ओर ईमानदारी से नजर रखने की आवश्यकता है, नही तो मौकापरस्त मोरवीर सरकारी खजाना पर बेखौफ डाका डालते हुए कहेंगे-
छत्तीसगढ़ राज में भई खिलाडिय़ों की भीड़।
इवेंट मैनेजर मुर्गा काटे
खेले खाए उसे मोरवीर।।
खेलोगे नहीं तो खिलोगे कैसे? – विजय मिश्रा
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