छत्तीसगढ़ रजत महोत्सव वर्ष मना रहा है। सरकार ताल ठोंक ठोंक कर हरेक क्षेत्र में हुई प्रगति को जनमन के हृदय में उतारने को आतुर है। सबका साथ- सबका विकास- सबका विश्वास को विज्ञापनों के माध्यम से अनवरत प्रदर्शित भी किया जा रहा है। सुशासन के साथ गावं शहरों में हो रही उन्नति के लिए आए दिन राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी छत्तीसगढ़ की धरा गौरवान्वित हो रही है। सिर उठाकर, छप्पन इंची छाती फूलाकर चलने लायक ऐसे दौर में छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर बड़ी मात्रा में हो रही अफीम की अवैध खेती ने सब गुड़ गोबर एक कर दिया है।छत्तीसगढिय़ा सबले बढिय़ा के नारा में गोता लगाता छत्तीसगढ़ आज नक्सलियों से मुक्त होने की दहलीज पर खड़ा है, किंतु पिछले एक पखवाड़ा में अफीम की अवैध खेती के परत दर परत खुलते राज ने सांप के फन की तरह अनगिनत सवालों को खड़ा कर दिया है। प्रभु श्री राम के ननिहाल की पावन भूमि कोदो ,कुटकी, चना, धान, सहित छत्तीस किस्मों की भाझियों के लिए प्रसिद्ध है।जल- जंगल -जमीन खनिज सम्पदाओं से परिपूर्ण ऐसे छत्तीसगढ़ की मिट्टी में अफीम की अवैध खेती करने वालों ने जघन्य अपराध किया है। हरा भरा धान कि कटोरा छत्तीसगढ़ को अफीम का कटोरा के नाम से कलंकित कर दिया है।भोला भाला छत्तीसगढिय़ा अफीम माफियों की जाल में फंसता हुआ दिखाई दे रहा है। दुर्ग, रायगढ़, बलरामपुर में हो रही अफीम की अवैध खेती पुख्ता प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ की उपजाऊ जमीन और सीधे साधे छत्तीसगढ़वासियों पर दीगर प्रांत के अपराधिक तत्वों की कुदृष्टि पड़ चुकी है।भारत के मानचित्र पर तेजी से उभरते नवोदित राज्य छत्तीसगढ़ के माथे अफीम की खेती एक अमिट कलंक के रूप में दर्ज हुई है। इस कलंक ने एक बार पुन: छत्तीसगढ़ वासियों को झकझोरते हुए आंख खोल कर जीने के लिए प्रेरित किया है। यद्यपि अफीम की अवैध खेती की जानकारी मिलने के उपरांत अविलंब सरकार ने कड़े कदम उठाए हैं। गांव गांव में खोजी दस्ते सक्रिय हो गए हैं। 27, मार्च तक सभी जिलों के अधिकारियों से यह सुनिश्चित करते हुए प्रमाण पत्र मांगा गया है कि उनके क्षेत्र में कहीं भी अफीम की खेती नहीं हो रही है। बलरामपुर में अन्ठावन पटवारियों का तबादला और दुर्ग की कृषि विस्तार अधिकारी को सस्पेंड कर दिया गया है। हालांकि यह तो आग लगने पर ही कुआं खोदें वाली बात है। छत्तीसगढ़ी में ऐसी ही नीति को ही कहते हैं गुड़ खाए गंगू पिटान खाए टूकना अर्थात करे कोई भरे कोई। पुलिस प्रशासन क्षेत्रीय पंचायत, ग्रामीण जनों के नाक के नीचे अफीम की खेती बड़े पैमाने पर हो रही थी,फिर भी सब के सब बेखबर चैन की नींद कैसे सो रहे थे? इस घोर लापरवाही के लिए प्रशासन जितना जिम्मेदार है उससे कहीं ज्यादा नागरिक जिम्मेदार हैं। कई एकड़ क्षेत्र में अफीम की अवैध खेती रातों-रात चोरी छिपे नहीं हो सकती। खेतों से अन्यत्र स्थानों फर अफीम का परिवहन कोई अदृश्य मानव नहीं करता है। बीज बोने से लेकर काटने में महीनों का समय लगता है। इसके बावजूद अफीम की खेती होने वाले क्षेत्र के रहवासियों, कानून के रक्षकों को भनक तक नहीं लगी। जाहिर कि वे सबके सब सोते रहे या फिर स्वहित के चक्कर में नैतिकता बेचकर जागते हुए भी सोने का नाटक करते रहे।ऐसे ही लोगों को जागरूक रहने के लिए धनपाल भाटिया लिखते हैं- कभी चबा लिया करो एक दो पत्ते नीम के,नहीं तो शौकीन हो जाओगे किसी दिन अफीम के। खैर, कहते हैं जब जागे तभी सबेरा,जो होता है अच्छे के लिए होता है। अभी पानी सर के उपर से गुजरा नहीं है।अफीम उत्पादक माफियों का पैर छत्तीसगढ़ में अंगद के पैर की तरह जमने के पहले ही उजागर हो गया है,अर्थात बुराई पर अच्छाई की जीत होती ही है। अब जब मामला उजागर हो गया है तो सरकार को चाहिए कि प्रदेश की और खुद की गिरती हुई साख को बचाने के लिए पूर्ण पारदर्शिता के साथ युद्धगति से इसकी जांच करे। दोषियों के आकाओं की परवाह किए बिना उन्हें कड़ी से कड़ी सजा देकर छत्तीसगढ़ में सुशासन होने का प्रमाण दे। यह भी विचारणीय है कि आम जनता जो कि जरा जरा सी बात पर अपने अधिकारों के लिए लड़ पड़ती है। उसी तरह अपने आसपास हो रहे अवैध कार्यों को रोकने लिए भी जागरुक होना चाहिए। छत्तीसगढ़ में कहावत प्रचलित है कि कुत्ते की आंख इक्कीस दिन में खुलती है किन्तु आदमी की आंख खुलने में इक्कीस वर्ष लग जाते है। छत्तीसगढ तो अब पच्चीस वर्ष का गबरू गोल्लर हो गया है। अब तो छत्तीसगढ़ वासियों को हर अवैध कार्यों को रोकने के लिए जागना ही चाहिए। रामेश्वर वैष्णव जी के शब्दों में कहना होगा मन ल तें पोठ करके भीड़बे त कइसनो परबत उतान हो जाही। घर के सियान सुते रही त बाहिर के पहुना घर के सियान हो जाही।
अफीम उत्पादन में आगे बढ़ता छत्तीसगढ़ – विजय मिश्रा
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