बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक शिक्षक के खिलाफ फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र के आधार पर आपराधिक कार्रवाई शुरू करने के आदेश को रद्द करते हुए उसे बड़ी राहत दी है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि, केवल बाद की मेडिकल जांच के आधार पर पुराने प्रमाणपत्र को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि, मूल प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में किसी प्रकार की धोखाधड़ी हुई थी।
दरअसल,यह मामला महासमुंद जिले में कार्यरत सहायक शिक्षक (एलबी) लखन बिहारी पटेल से जुड़ा है। याचिकाकर्ता को सुनने में दिक्कत थी, जिसके चलते उसने 10 अगस्त 2010 को मेडिकल बोर्ड के समक्ष जांच कराई थी। जांच में उसे 45.4 प्रतिशत कंडक्टिव हियरिंग लॉस पाया गया, जिसके आधार पर उसे दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी किया गया। इसी प्रमाणपत्र के सहारे उसने शिक्षाकर्मी ग्रेड-3 के पद के लिए आवेदन किया और चयन प्रक्रिया पूरी करने के बाद वर्ष 2010 से पद पर कार्यरत है।
बता दे,यह विवाद तब शुरू हुआ जब याचिकाकर्ता के भाई कैलाश चंद्र पटेल ने 12 दिसंबर 2017 को महासमुंद कलेक्टर के समक्ष शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि, शिक्षक ने गलत दिव्यांगता प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी प्राप्त की है। मामले की जांच के लिए कलेक्टर ने एसडीओ (राजस्व) सरायपाली को निर्देश दिए। जांच के बाद वर्ष 2018 में याचिकाकर्ता के खिलाफ रेवेन्यू केस दर्ज किया गया और उसके दस्तावेजों की जांच की गई। जांच रिपोर्ट में आपराधिक कार्रवाई की अनुशंसा की गई, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट में सुनवाई जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की अदालत में हुई। कोर्ट ने कहा कि, प्रशासनिक या जांच अधिकारियों ने 2010 में जारी वैध प्रमाणपत्र को 2018 की मेडिकल जांच के आधार पर गलत ठहराने में जल्दबाजी की है, जो विधिक रूप से उचित नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि, दिव्यांगता जैसी स्थिति समय के साथ बदल सकती है, इसलिए किसी प्रमाणपत्र को केवल बाद की स्थिति के आधार पर अमान्य नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि, जब तक यह साबित न हो कि प्रमाणपत्र जारी करने की मूल प्रक्रिया में कोई धोखाधड़ी या गलत जानकारी दी गई थी, तब तक उसे निरस्त नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने के आदेश को रद्द कर दिया और उसे राहत प्रदान की।
