नाम बड़े और दर्शन छोटे – डॉ.माणिक विश्वकर्मा

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जब किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान के संदर्भ में बहुत बढ़ाचढ़ाकर कहा जाए और वह अपनी प्रसिद्धि एवं घोषित योग्यता के अनुरूप न निकले या दूसरे शब्दों में कहें तो ख्याति के अनुसार उसके गुण न मिलें और उम्मीद से कम परिणाम मिलें तब लोकोक्ति ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे का प्रयोग किया जाता है। आज यह लोकोक्ति अधिकांश राजनेताओं, कलाकारों, समीक्षकों, वक्ताओं, भाषाविदों, साहित्यकारों, संगीतकारों, संपादकों, पत्रकारों, समाजसेवियों एवं जनप्रतिनिधियों पर एकदम सटीक बैठती है। ऐसे लोगों के लिए ढपोरशंख एवं ऊँची दुकान, फीके पकवान जैसे शब्दों का प्रयोग भी खूब किया जाता है। किसी खास मुद्दे पर बहस के लिए बुलाए गये संसद के विशेष सत्र में कोई परिणाम का न निकलना, क्षेत्र का हितैषी बनकर एवं लोकलुभावन वादों के बल पर जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद कोई काम न करना, नेताओं द्वारा विकास की तमाम घोषणाओं के बावजूद विकास का न होना को ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे की श्रेणी में रखा जा सकता है। कुछेक फिल्मों को छोड़कर बड़े कलाकारों एवं भारीभरकम बजट की ऐसी फिल्में जो फ़कत विदेशी फिल्मों की नकल होती हैं का मुँह के बल धराशायी होने के अनेक उदाहरण दिखाई देते हैं। बहुत सी प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं में उनके नाम एवं पहचान के अनुरूप आजकल ऐसी सामग्रियां नहीं होती बार बार पढऩे का मन करे। यही वजह है पाठकों की संख्या निरंतर घट रही है और साहित्यिक पत्रिकाओं के बंद होने का सिलसिला बदस्तूर ज़ारी है। इन्हें भी हम ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे की संज्ञा दे सकते हैं। विगत दिनों मुझे राजधानी में आयोजित कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों के विमोचन, साहित्यिक परिचर्चाओं एवं समीक्षाओं में नामचीन विद्वानों, भाषाविदों एवं वक्ताओं के साथ शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मन तो ये देखकर तब खट्टा हो गया जब अधिकांश विद्वान वक्ता एवं अतिथि या तो स्वयं को महिमामंडित करने में जुट गये या विषयांतर होकर इधर-उधर की अनौपचारिक बातें करने लगे। ऐसे में आयोजनकर्ता का चेहरा देखने लायक होता है। बेवजह ताली बजाना और बजवाना भी उसकी विवशता होती है। आजकल मंचासीन लोग भी योग्यता आधारित न होकर एक निश्चित फार्मेट के तहत निर्धारित किए जाने लगे हैं। जैसे संस्था या समिति का अध्यक्ष और जिसकी पुस्तक का विमोचन होना है वो तो मंच पर बैठेगा ही।मुख्य अतिथि और अध्यक्ष दो ऐसे लोगों को बनाया जाता है जिनका थोड़ा-बहुत नाम हो और भले विषयवस्तु के बारे में बोलें या न बोलें लेकिन कार्यक्रम की प्रशंसा करने में माहिर हों। पाँचवा व्यक्ति आयोजक की पसंद का मुख्य वक्ता या समीक्षक होता है जिसके जिम्मे होता है विनम्रतापूर्वक पुस्तक की समीक्षा करना एवं कवि या लेखक के बारे में तारीफ़ों के पुल बाँधना। अब बात आती है विशिष्ट अतिथियों की तो प्राय: हर कार्यक्रम में दो-तीन विशिष्ट अतिथि ऐसे लोगों को बनाया जाता है जो या तो आयोजकों के मित्र होते हैं या समाचार पत्रों के प्रतिनिधि ताकि कार्यक्रम भले अंड-बंड हो लेकिन उसकी रिपोर्टिंग धाँसू ढंग से हो जाए। इसके बाद यदि मंच पर कुर्सी खाली बची तो उसमें बाकायदा संचालक विराजमान हो जाता है। आयोजक द्वारा भेंट किए जाने वाले प्रतीक चिन्ह भी विद्वता की जगह पद और प्रभाव के आधार पर बने दिखाई देते हैं। यह शाश्वत सच है कि किसी भी व्यक्ति की पहचान उसकी प्रतिभा एवं काबिलियत से होती है नाकि क़द और पद से। क्योंकि क़द और पद प्रशासनिक होते हैं जबकि प्रतिभा ईश्वरदत्त होती है और सत्य-चेतना, समन्वय एवं नि:स्वार्थ कर्मयोग पर आधारित होती है। किसी भी शासन, प्रशासन, कला, साहित्य, संगीत, धार्मिक एवं सामाजिक कार्य के आयोजन के दौरान इस बात का ध्यान सदैव रखना चाहिए कि जनमानस में उसका स्वरूप ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे लोकोक्ति के रूप में न जाने पाए।