बेहद शर्मनाक घटना! – गिरीश पंकज

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यह कितने दुख की बात है कि पिछले दिनों शाहजहांपुर में 1972 में स्थापित शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खां और रोशन सिंह की प्रतिमाएं बुल्डोजर से तोड़ कर गिरा दी गईं! आजादी के लिए शहीद होने वाले क्रांतिकारियों के साथ ऐसा व्यवहार बेहद शर्मनाक है.यह बहुत बड़ा अपराध है. वैसे पता चला है कि दोषी अधिकारी को निलंबित किया गया है. सरकार ने फिर से मूर्तियां स्थापित करने का आदेश भी जारी किया है. दुर्भाग्य की बात है कि इस देश में ऐसी स्वतंत्रता सेनानियों के अपमान की शर्मनाक घटनाएँ होती रहती हैं. बटुकेश्वर दत्त के साथ क्या हुआ था,जिन्होंने सरदार भगत सिंह के साथ दिल्ली की असेंबली में अंग्रेजी हुकूमत को जाग्रत करने के लिए बम फेंका था। (और इस सतर्कता के साथ फेंका था कि कोई जनहानि न हो) भगत सिंह को फांसी हुई और बटुकेश्वर दत्त को पन्द्रह साल की काले पानी की सजा हुई। सजा काट कर बटुकेश्वर रिहा हुए और दुर्भाग्य इस देश का कि आजादी के बाद वे रोजी-रोटी के लिए दर-दर की ठोकरें खाते रहे। बस चलाने का परमिट लेने जब वह एक अधिकारी से मिले तो उस नीच ने इनसे बटुकेश्वर दत्त होने का प्रमाण पत्र मांगा।यह और बात है कि बाद में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू ने इस घटना पर दुख जताया और कमिश्नर ने बटुकेश्वर दत्त से माफी भी मांगी। बटुकेश्वर दत्त अंतत: शारीरिक दृष्टि से कमजोर होते गए। इलाज के लिए पटना अस्पताल में भर्ती हुए। वहां भी उनको ठीक से उपचार नहीं मिला, तो उन्हें दिल्ली लाया गया। 20 जुलाई 1965 को उनका निधन हो गया। बटुकेश्वर दत्त की अंतिम इच्छा थी कि भगत सिंह की समाधि सामने उनकी समाधि बने। इस देश की राजनीति ने आजादी के बाद जीवित रह गए स्वतन्त्रता सेनानियों के साथ ठीक व्यवहार नहीं किया। चन्द्रशेखर आजाद की मां को ‘डकैत की मांÓ कहकर अपमानित किया जाता रहा। झांसी में उनकी प्रतिमा भी स्थापित नहीं होने दी गई थी। मैंने एक नुक्कड़ नाटक लिखा था, जिसमें एक स्वतंत्रता सेनानी ताम्रपत्र दिखाकर भीख मांग रहा है। यह खबर मैंने एक अखबार में पढ़ी तो उसके बाद नुक्कड़ नाटक लिखा था, जिसका अनेक स्थानों में मंचन भी हुआ। यह भी किसी से छिपा नहीं कि सरदार भगत सिंह की बहिन दाने-दाने को मोहताज हुई थी। श्रीकृष्ण सरल क्रांतिकारियों पर लिखी पुस्तकें प्रकाशित करवाना चाहते थे, जिन्हें कोई नहीं छाप रहा था। अंतत: उन्होंने तमाम कष्ट सहते हुए खुद उनका प्रकाशन किया। कई बार मैं सोच कर संतोष करता हूं कि अच्छा हुआ आजादी की लड़ाई लड़ते हुए भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु,चंद्रशेखर आजाद आदि शहीद हो गए. अगर ये जीवित रह जाते तो इस देश में उनकी बहुत दुर्गति होती. इस तथाकथित लोकतंत्र में वे जब अन्याय देखकर आंदोलन करते, तो उन्हें जेलों में ठूस दिया जाता. इस देश में लोकतंत्र एक पाखंड जैसा बन कर रह गया है. आज भी लोकहित के मुद्दे पर प्रदर्शन करने वालों को जेल भेज दिया जाता है. उन पर लाठी गोली से हमला किया जाता है. ऐसे में अंग्रेजी राज और लोकतांत्रिक राज में भेद क्या रह गया? आज भी अगर प्रदर्शन करने के लिए पुलिस की अनुमति चाहिए तो यह कैसा लोकतंत्र है? प्रदर्शन करने के लिए पुलिस को सिर्फ सूचना दी जानी चाहिए ताकि वह वहां समुचित व्यवस्था बना सके. यह लोकतंत्र नहीं है कि अगर पुलिस ने इजाजत नहीं दी तो कोई प्रदर्शन नहीं कर सकता. यह आधा-अधूरा लोकतंत्र है. मुझे लगता है इस व्यवस्था पर फिर से विचार करना चाहिए. और हर सरकार को यह समझना चाहिए कि देश के लिए जिन्होंने बलिदान किया है, उनका हम सम्मान करें, न कि उनकी मूर्तियों को तोड़े, नष्ट करें.