रघु ठाकुर
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम 2026, जिसे शिक्षा व्यवस्था में समानता का नियम बताया जा रहा है और समाज के एक हिस्से के द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है। जो विरोध करने वाले मित्र हैं उनका यह तर्क है कि इस कानून में जो कमेटियां जांच पड़ताल के लिए बनाई जा रही हैं, उनमें सवर्ण समाज का कोई घोषित प्रतिनिधि नहीं है, दूसरा यह कि यह तबका यह मान रहा है कि इसका अर्थ सवर्ण समाज के लिए ही जातीय भेदभाव या अपमान के लिए पहले से ही दोषी मानना है। क्योंकि उनके अनुसार सवर्ण समाज के प्रतिनिधि को इसमें नहीं रखा गया है। इस विरोध में करणी सेना, धर्म गुरु भी शामिल हुए है। एक महामंडलेश्वर श्रीगिरी महाराज ने तो 23 जनवरी से दिल्ली में आमरण अनशन करने की घोषणा और अपनी जान देने की भी घोषणा की थी।
उन्होंने अपने वीडियो रिकार्ड बयान में इस कानून के लाने वालों के लिए काफी श्राप भी दिए हैं उनके आप कितने प्रभावी होंगे यह मैं नहीं जानता हूं। उनके उपवासध्अनशन के बारे में भी कोई खबर अभी तक नहीं मिली है। साधु समाज की ओर से भी उनके पक्ष में या विपक्ष में कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है। करणी सेना और कुछ संगठनों ने अवश्य ही कुछ स्थानों पर विरोध प्रदर्शन किया है। वैसे भी करणी सेना पिछले कुछ वर्षों से काफी चर्चा में है और जहां तहां उनका आक्रामक व्यवहार सामने आ रहा है। इसकी शुरूआत राजस्थान में श्पद्मावतीय फिल्म के निर्माता के साथ मारपीट हुई थी और अब यह देश के विभिन्न इलाकों में जाति आधार पर घरना, प्रदर्शन विरोध आदि करके अपनी ताकत कीपहचान बना रहे हैं। यह मुख्यतरू राजपूतों का संगठन है और अभी कुछ दिनों पहले हरदा में एक कार्यक्रम के बाद उन्होंने यह भी घोषणा की है कि वह अब चुनाव लड़ेंगे। यह कोई आकस्मिक घटना या कोई योजना है, इसकी पड़ताल की जानी चाहिए।
जिस कानून के बारे में अभी काफी तेज चर्चा चल रही है, उस कानून के पहलुओं को और पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। कुछ वर्ष पहले जब हैदराबाद के एक नौजवान रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी और उसकी वजह यह बताई गई थी कि उनके विरुद्ध झूठी शिकायत के आधार पर जो विद्यार्थी परिषद के लोगों ने की थी, उनकी छात्रवृत्ति रोक दी गई थी। दरअसल रोहित वेमुला के ऊपर विद्यार्थी परिषद के एक विद्यार्थी ने मारपीट का आरोप लगाया था और उस संबंध में शिकायती पत्र वहां के सांसद जो उस समय केंद्रीय मंत्री थे और स्वतरू पिछड़ी जाति के बघेल समाज से थे, को आवेदन भेजा था। जैसे कि एक सामान्य प्रक्रिया होती है कि आमतौर पर प्राप्त आवेदनों की जनप्रतिनिधि या मंत्री संबंधित विभाग को जांचकर आवश्यक कार्रवाई हेतु भेज देते हैं। वैसा ही एक पत्र मंत्री की ओर से उस्मानिया विश्वविद्यालय के कुलपति के पास गया था। कुलपति ने उसके बाद जो भी जांच की हो या जांच की प्रत्याशा में रोहित वेमुला की छात्रवृत्ति रोक दी थी और कुछ दिन रोहित वेमुला छात्रावास में अपने विश्वविद्यालय के अध्यापक के पास रहे थे। हालांकि बाद में उन मंत्री को भी दोबारा मंत्रिमंडल विस्तार में स्थान नहीं मिला था। अगर इसका आधार रोहित वेमुला की घटना थी, तो मैं समझता हूँ कि इन मंत्री के साथ यह अन्याय था। इन मंत्री से मेरी मुलाकात हुई है और वह एक सीधे-साधे व्यक्ति हैं। उन्होंने कोई दुर्भावनापूर्वक कार्रवाई को नहीं लिखा, बल्कि एक सामान्य पत्र अग्रेषित किया था।परंतु इतना दबाव मीडिया के माध्यम से बनादिया गया कि जैसे उन्होंने ही वेमुला को निकालने का आदेश दे दिया हो।
महिला को पीडित पक्ष के रूप में शामिल किया गया था। ऐसा बताया जाता है कि संसदीय समिति में किसी बीजेपी के सांसद ने यह कहा कि जब जातीय भेदभाव को मिटाने की बात हो रही है और कानून बनाया जा रहा है तो इसमें पिछडे वर्ग के लोगों को शामिल करना चाहिए। श्री दिग्विजय सिंह ने बतौर अध्यक्ष इसका समर्थन किया और संसदीय समिति ने उनके हस्तक्षेप पर सर्वसम्मति से इस संशोधन को स्वीकार किया। जो अब इस विनियम के रूप में 13 जनवरी को 2026 को लागू हुआ है। इस विनियम के द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को अधिकार दिए गए हैं और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने देश के तमाम विश्वविद्यालयों को अपने-अपने क्षेत्र में समानता के व्यवहार के लिए और विषमता को, या जातीय भेदभाव और अपमान को, मिटाने के लिए कमेटियां बनाने का, उसकी प्रक्रिया का, उसके दंड नियम का प्रारूप सभी विश्वविद्यालयों को भेजा है। जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की अधिसूचना भारत के राज्यपत्र में 13 जनवरी को प्रकाशित हुई है इसको मैंने पढ़ा है। इसको पूरा पढ़ने के बाद मुझे नहीं लगता कि किसी भी पक्ष को इससे कोई शिकायत होना चाहिए। जो परिभाषाएं नियम 3 में दी गई हैं उसके एक (ख) में लिखा गया है कि पीडित व्यक्ति का अर्थ ऐसे व्यक्ति से है जिसके पास विनियम के अंदर अंतर्गत शिकायतों के संबंध में कोई शिकायत है। जाति आधारित भेदभाव का अर्थ भी अनुसूचित जातियों, जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जातीय या जनजाति के आधार पर भेदभाव है। जो कमेटी किसी शिकायत के प्राप्त होने के बाद जांच के लिए बनाई जा रही हैं उसके अध्यक्ष विश्वविद्यालय के कुलपति या संस्था के प्रमुख होंगे। जो सदस्य इस समिति में शामिल होगे, यानि जांच समिति में उसमें संबंधित शिक्षा संस्थान के तीन प्रोफेसर, तीन प्रोफेसर वरिष्ठ संकाय सदस्य, उच्च शिक्षासंस्थान का एक कर्मचारी, शिक्षक के अतिरिक्त व्यावसायिक अनुभव रखने वाले नागरिक, समाज के प्रतिनिधि, दो छात्र प्रतिनिधि, जिनका नामांकन उनकी गतिविधियों के आधार पर किया जाएगा, विशेष आमंत्रित के रूप में शामिल किए गए हैं। अब जांच समिति के इस संगठनात्मक ढांचे को किसी जाति तक सीमित नहीं किया गया है और यह जो सदस्य हैं इन्हें नामजद करने वाला नाम किसी अधिकृत व्यक्ति किसी भी समूह से चाहे वह सवर्ण हो या वह अवर्ण, नामजद कर सकता है।
इसी नियम पांच के 7 में लिखा गया है कि समिति में अन्य पिछडा वर्ग, दिव्यांगजन, अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इसमें यह नहीं लिखा गया कि सभी सदस्य इन्हीं वर्गों के होंगे बल्कि एक विश्वास के लिए ताकि जांच कमेटी पर विश्वास रहे और निष्पक्ष जांच के लिए भी इन वर्गों के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई है। कुल सदस्य प्रमुख को मिलाकर 10 होते हैं और जिनका प्रतिनिधित्व दिए जाने की व्यवस्था की गई है उनकी संख्या केवल पांच है। अतरू शेष पांच में इन वर्गों को छोड़कर सवर्ण समाज के लोग भी हो सकते हैं। यहाँ कहा जा सकता है कि, सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों की अनिवार्यता नहीं रखी गई है, परंतु यह अनिवार्यता कैसे हो सकती है। अनिवार्यता तो पीड़ित पक्ष या शिकायतकर्ता की ही होनी चाहिए। ताकि निष्पक्ष जांच में तथ्यों के प्रस्तुतीकरण में उनका पक्ष रख सके। जहां तक सवर्ण के साथ जातिगत भेदभाव की बात है तो यह सामान्य घटनाएं नहीं है। कभी-कभी ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं और उनके लिए कई प्रकार के कानूनें हमारे भारतीय न्याय संहिता में मौजूद हैं। घृणात्मक व्यवहार को लेकर सर्वोच्च न्यायालय और अनेकों उच्च न्यायालयों ने इसी आधार पर कार्रवाई करने के आदेश भी दिए हैं। पिछले दिनों हुई घटनाओं का अध्ययन करना होगा। मुझे एक सवर्ण मित्र ने बताया कि पिछले दिनों जो छात्रों की आत्महत्याओं की घटनाएं हुई हैं। उनमें से अधिकांश आत्महत्याएं एससी, एसटी. ओबीसी महिला. दिव्यांगजन आदि कीहुई है और अनेक लोगों ने यह बताया है कि जब यह लोग प्रवेश परीक्षा पास कर प्रवेश लेकर पढ़ने को पहुंचते हैं तो उनके विरुद्ध जातिसूचक या उन्हें अयोग्य बताने वाली घटनाएं आम होती है, जो लोग आरक्षित कोटे से जाते हैं उन्हें ऐसे व्यंग से पुकारा जाता है कि यह आरक्षित कोटे से है और उनकी योग्यता को जानबूझकर नकार कर उनमें हीन भाव पैदा किया जाता है। इसी प्रकार बेटियों के साथ अपमानजनक व्यवहार होते हैं। कहीं कहीं गुंडई भी होती है। ये बेटियां भयभीत होकर कई बार तो शिकायत भी नहीं कर पाती और कई बार शिकायत करती भी हैं तो उन पर तंत्र कोई ध्यान नहीं देता है। क्योंकि ताकतवरों की संगठन शक्ति से कोई नहीं लडना चाहता। कई बार बेटियां इसलिए भी भयभीत होती हैं कि अगर वे घर पर शिकायत करती हैं तो उनके घर वालों पर भी हमला हो सकता है या उनकी पढ़ाई बंद कराई जा सकती है या उन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से, गपशप के माध्यम से बदनाम किया जा सकता है। इस प्रकार से वह घुटते-घुटते कई बार आत्महत्या कर लेती हैं।
मुझे आश्चर्य है कि हमारे सवर्ण समाज के मित्र जिन्हें इस विनियम के पक्ष में खड़ा होना चाहिए था और पीड़ितों के साथ-सहारा बनना चाहिए था वह क्यों इसका विरोध कर रहे हैं? करणी सेना क्षत्रियों का संगठन है और क्षत्रियों का धर्म ही कमजोर की रक्षा है तो क्षत्रिय समाज कैसे इसका विरोध कर सकता है। भगवान राम क्षत्रिय थे और सदैव कमजोर के पक्ष में खड़े हुए। फिर अगर कोई अन्याय की घटना कमेटी के द्वारा की जाती है तो उसके खिलाफ अपील का प्रावधान है और न्यायपालिका के दरवाजे तो खुले हुए हैं। बेहतर तो यह होता कि इन नियमों के व्यावहारिक प्रयोग को कुछ समय देखा-परखा जाता और प्राप्त परिणामों के आधार पर इनकी पुष्टि, इनका मूल्यांकन या इनका विरोध होता। परंतु बगैर किसी प्रयोग के ही विरोध करना और वह भी तार्किकता का ना हो तो आश्चर्यजनक है ।इस विनियम में यह भी प्रावधान किया गया है कि अगर कोई पक्ष पीड़ित है। तो निर्णय के 30 दिन के भीतर ओम्बड्स मैन (लोकपाल) के सामने अपील कर सकता है। वह और एमिकस क्यूरी की नियुक्ति कर सकते हैं। यह भी प्रावधान किया गया है कि 30 दिन के भीतर ऐसी अपील का निराकरण करने के सब उपाय होने चाहिए। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को उन संस्थाओं के विरुद्ध कार्रवाई करने का प्रावधान किया गया है। जिसमें इन विनियमन नियमों का पालन नहीं करने का पालन नहीं होता है या दोषियों पर कार्रवाई नहीं की जाती है। अगर विनियम की बनावट को लेकर कोई शिकायत भी थी या कोई संदेह था तो क्या यह बेहतर नहीं होता की आपत्तिकर्ता पक्ष विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अधिकारियों से मिलते सत्ताधारी राजनीतिक दल भाजपा और अन्य सभी संसदीय समिति के सदस्यों या उनके दलों के नेताओं से मिलते। उन्हें अपना पक्ष बताते और मिलजुल कर कोई हल सर्वसम्मति से निकालने का प्रयास करते। क्योंकि संसदीय समिति ने सर्वसम्मति से हल निकालने यह विनियम पास किया है। यानी यह तो समूची संसद् का बौद्धिक निर्णय है और समूची संसद के बौद्धिक क्षमता को नकारना, उसकी आलोचना करना, उसके खिलाफ बयान बाजी करना, कैसे उचित ठहराया जा सकता है। क्योंकि यह नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के संदर्भ में बने हैं। अतरू अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के पास विचारण हेतु पहुंच गया है। एक मित्र ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, और उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट विचार कर इस पर निर्णय करेगा ताकि समाज में तनाव पैदा ना हो। और सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल विनियम क्रियान्वयन पर स्थगन आदेश दे दिया है। सुप्रीम कोर्ट के सी.जे.आई. ने तो याचिका पेश होने से पहले ही कह दिया था कि वे इस याचिका को सुनने के इच्छुक हैं तथा अगले ही दिन याचिका पेश होते ही उन्होंने स्थगन आदेश भी दे दिया। इस प्रकरण पर शीर्ष अदालत की इस सक्रियता को देखकर देश आशान्वित है कि अब शायद सभी प्रकरणों में सुप्रीम कोर्ट ऐसे ही शीघ्रता से निर्णयकरेगा। एससी, एसटी और ओबीसी के लोग और छात्र भी इस विनियम के पक्ष में खड़े हो रहे हैं, जुलूस और प्रदर्शन कर रहे हैं, और कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि कुलपति अगर सवर्ण वर्ग से होगा तो इन वर्गों को न्याय कैसे मिलेगा? वह दूसरे प्रकार की आशंका प्रकट कर रहे हैं कि कुलपति अगर सवर्ण होगा तो क्योंकि वह विश्वविद्यालय का प्रमुख शासक होता है और उसके दबाव में शिक्षक रहते हैं अतरू वह जैसा चाहेगी वैसा फैसला कर लेगा तथा इसका लाभ उन अपराधियों को मिलेगा जो भेदभाव करते हैं और सवर्ण समाज से हैं। मैं अन्य पिछडा वर्ग, एससी, एसटी के छात्रों या नौजवानों कि इस आशंका से भी सहमत नहीं हूँ।
किसी भी व्यक्ति या संस्था के बारे में पूर्व धारणा बनाना कि वह गलत ही करेंगे यह मानव के प्रति मूल अविश्वास है। यह भी नहीं भूलना चाहिए की देश में कितने ही सवर्ण जातियों में जन्मे लोग ऐसे हुए हैं जो अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के पक्ष में, महिलाओं या दिव्यांगों के पक्ष में, जमकर खड़े हुए और उनमें चेतना पैदा की है। गौतम बुद्ध भी क्षत्रिय थे, जयप्रकाश और लोहिया जी भी सवर्ण थे, मामा बालेश्वर दयाल भी ब्राह्मण थे, और ऐसे देश के कितने ही नाम गिनाए जा सकते हैं जहां सवर्ण जाति के घर में जन्मे लोगों ने पिछडे वर्ग, अनुसूचित जाति, जनजाति, महिलाओं को न्याय दिलाने, उनमें चेतना पैदा करने में अपना सारा जीवन लगा दिया। आजादी के पहले महात्मा गांधी थे तो आजादी के बाद डॉक्टर राम मनोहर लोहिया थे। जिन्होंने कहा था की पिछडे पांवें 100 में 60 और उस जमाने में हम नौजवानों से अपील की थी कि तुम सवर्ण लोगों को समाज में परिवर्तन के लिए खाद बनना चाहिए। लोहिया ने कहा था कि और इसलिए पहले योग्यता, फिर अवसर का सिद्धांत गलत है। आर अंबेडकर के द्वारा उनकी आलोचना करने पर कहा था कि योग्यता अवसर से आती है महात्मा गांधी ने तो डॉ. बी हमारे पुरखों ने इनके साथइतने अन्याय किए हैं कि हमें गाली तो क्या अगर ये हमें पीटते भी हैं तब भी हमें उसे चुपचाप सहन कर अपने अतीत की गलतियों का प्रायश्चित करना वाहिए। कुल मिलाकर दोनों ही पक्ष केवल आशंका पर मैदान में है। इन आशंकाओं को क्या पीछे से कोई और हवा दे रहा है? यह भी विचारणीय है।
कई प्रबुद्ध लोगों ने और विशेषकर के सवर्ण और अवर्ण जातियों के प्रबुद्ध जनों के विचार मैंने सुने हैं, बातचीत भी की है और एक संभावना यह भी उमरी हैं कि यह सब सत्ता के शीर्ष से प्रायोजित ड्रामा है ताकि सवर्ण नौजवान और सवर्ण संगठन इस विनियम के आधार पर सत्ता पक्ष का विरोध करें और सत्ता पक्ष को बगैर कहे और बगैर मांगे पिछडे वर्ग- एससी-एसटी महिला आदि का समर्थन प्राप्त हो जाए तथा इन वर्गों के बीच में क्रांतिकारी सिद्ध हो जाए।
रघु ठाकुर लोहिया सदन, जहाँगीराबाद,
भोपाल रूपंडीनजीनत 10 लीववण्पद 9312481593
