नई दिल्ली। महिला आरक्षण से जुड़े संशोधन विधेयक को लेकर संसद में चर्चा तेज हो गई है। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए कहा कि यह कदम महिलाओं को उनका लंबे समय से लंबित अधिकार दिलाने के लिए उठाया गया था। उन्होंने इसे 21वीं सदी की महिलाओं को सशक्त बनाने का बड़ा प्रयास बताया। दरअसल, 16 अप्रैल को केंद्र सरकार ने लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश संशोधन विधेयक 2026 पेश किए थे। इन तीनों विधेयकों का मकसद महिलाओं को जल्द से जल्द 33 प्रतिशत आरक्षण का लाभ देना था।सरकार का कहना है कि यदि 2026 की जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन का इंतजार किया जाता, तो महिलाओं को 2029 के चुनाव में भी आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाता। इसलिए इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए ये विधेयक साथ लाए गए। अगर ये तीनों विधेयक पास हो जाते, तो राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जाते और महिलाओं को 2029 के लोकसभा चुनाव में ही 33% आरक्षण मिल सकता था। इससे लंबे समय से लंबित महिला अधिकारों को लागू करने का रास्ता साफ हो जाता। परिसीमन को लेकर सरकार ने स्पष्ट किया कि इसका मतलब निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव होता है। वर्तमान में लोकसभा की सीटें 543 हैं, जो 1971 की जनसंख्या के आधार पर तय की गई थीं। अब देश की आबादी लगभग 140 करोड़ हो चुकी है, इसलिए सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा गया था, ताकि बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके। सरकार ने यह भी साफ किया कि परिसीमन आयोग के कानून में कोई बदलाव नहीं किया गया है और इसका मौजूदा चुनावों, जैसे तमिलनाडु या पश्चिम बंगाल, पर कोई असर नहीं पड़ेगा। 2029 तक सभी चुनाव वर्तमान व्यवस्था के अनुसार ही होंगे। सीट बढ़ाने के प्रस्ताव पर सरकार का तर्क है कि सभी राज्यों में लगभग 50 प्रतिशत की समान वृद्धि होगी, जिससे किसी राज्य को नुकसान नहीं होगा। दक्षिण भारत के राज्यों की हिस्सेदारी भी लगभग समान बनी रहेगी। इसके अलावा, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी बढ़ेगी। अनुमान के अनुसार, कुल सीटें बढ़ने पर आरक्षित सीटें 131 से बढ़कर करीब 205 तक पहुंच सकती हैं, जिससे इन वर्गों का प्रतिनिधित्व मजबूत होगा। जाति जनगणना को लेकर उठे सवालों पर सरकार ने कहा कि यह प्रक्रिया पहले ही शुरू की जा चुकी है और इसे टालने का कोई सवाल नहीं है। महिला आरक्षण में धर्म के आधार पर अलग कोटा देने की मांग पर सरकार ने साफ किया कि भारतीय संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं है। सरकार का कहना है कि महिला आरक्षण लागू करने के लिए परिसीमन जरूरी है और यह एक लंबी प्रक्रिया होती है, जिसमें करीब दो साल लग सकते हैं। इसी वजह से इसे तुरंत लागू करना संभव नहीं था। साथ ही, केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और पुडुचेरी—में भी महिला आरक्षण लागू करने के लिए अलग संशोधन लाया गया, क्योंकि ये क्षेत्र अलग कानूनों के तहत संचालित होते हैं।
संसद में महामंथन: लोकसभा सीटों के विस्तार और महिला आरक्षण पर केंद्र का ऐतिहासिक जवाब
