नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में, इंदौर और उज्जैन के करीब बसा देवास शहर अपनी कला, साहित्य और अध्यात्म के लिए जाना जाता है। इस शहर की सबसे बड़ी पहचान है यहां की ऐतिहासिक ‘माता टेकरी’, जहां आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ता है कि हर कोई मां की भक्ति में लीन हो जाता है। अगर आप भी यहां दर्शन करने की सोच रहे हैं, तो आइए जानते हैं इस चमत्कारिक और ऐतिहासिक स्थल से जुड़ी हर एक दिलचस्प जानकारी।
धार्मिक मान्यता: ऐसा माना जाता है कि दो देवियों (देवों) के वास के कारण ही इस स्थान का नाम ‘देवास’ पड़ा।
ऐतिहासिक मत: कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ‘दिवासा’ नाम के एक अंग्रेज व्यापारी के यहां आने के कारण इसका नाम देवास रखा गया। हालांकि, लोगों की गहरी आस्था देवियों के वास वाली कहानी को ही मानती है।
युवा लेखक अमितराव पवार के अनुसार, माता टेकरी को एक ‘रक्तपीठ’ माना जाता है। मान्यता है कि यहां माता सती के हृदय भाग से रक्त की बूंदें गिरी थीं। इसी पवित्र स्थान पर पहाड़ों के बीच से रक्तवाहिनी मां चामुंडा प्रकट हुईं, जबकि मां तुलजा भवानी यहां स्वयंभू अवतरित हुईं। दरअसल यहां मां तुलजा भवानी को ‘बड़ी माता’ और मां चामुंडा को ‘छोटी बहन’ या ‘छोटी माता’ कहा जाता है। एक पुरानी किंवदंती के अनुसार, एक बार दोनों बहनों में किसी बात को लेकर विवाद हो गया और वे नाराज होकर टेकरी छोड़कर जाने लगीं। बड़ी माता गुस्से में पाताल में समाने लगीं, जबकि छोटी माता टेकरी से नीचे उतरने लगीं। यह देखकर भैरवजी और हनुमानजी उन्हें मनाने आए। तब तक बड़ी माता का आधा शरीर पाताल में जा चुका था और छोटी माता काफी नीचे आ चुकी थीं। विनती सुनने के बाद दोनों देवियां उसी अवस्था में वहीं रुक गईं। यही कारण है कि आज भी बड़ी माता का आधा हिस्सा पाताल में माना जाता है।
जूनियर रियासत: इनकी कुलदेवी मां तुलजा भवानी थीं (कुछ लोग इन्हें होल्कर घराने की कुलदेवी भी मानते हैं)।
सीनियर रियासत: इनकी कुलदेवी मां चामुंडा हैं। वर्तमान में सीनियर रियासत का राजपरिवार (विधायक गायत्रीराजे पवार और उनका परिवार) यहीं निवास करता है। नौवीं शताब्दी के इस मंदिर का इतिहास बहुत गहरा है। उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य यहां अक्सर आते थे और उन्होंने यहां उज्जैन के हरसिद्धि मंदिर की तर्ज पर ‘दीपमालिका’ का निर्माण करवाया था।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि प्राचीन काल में टेकरी पर एक गुप्त सुरंग हुआ करती थी, जिसकी लंबाई लगभग 45 किलोमीटर थी। यह सुरंग सीधे उज्जैन की भर्तृहरि गुफा के पास निकलती थी। कहा जाता है कि राजा भर्तृहरि इसी गुप्त रास्ते से माता की पूजा और तपस्या करने यहां आते थे।
नाथ संप्रदाय: गुरु गोरक्षनाथ, राजा भर्तृहरि और शीलनाथ महाराज जैसे कई महान योगियों ने इसे अपनी साधना स्थली बनाया। यहां पूजा भी नाथ संप्रदाय की परंपरा से ही होती है।
संगीत की दुनिया: महान शास्त्रीय गायक पं. कुमार गंधर्व जब गंभीर रूप से बीमार हुए, तो वे देवास आ गए। यहां के आध्यात्मिक वातावरण ने उन्हें स्वस्थ कर दिया और वे यहीं बस गए। उनके अलावा उस्ताद रजबअली खां साहब और राजकवि झोकरकर जैसी कई महान विभूतियों का इस धरती से गहरा नाता रहा है। वहीं मंदिर खुलने का समय: सुबह 5:00 बजे से रात 11:00 बजे तक. तुलजा भवानी आरती: सुबह 5:50 बजे और शाम 6:10 बजे. चामुंडा माता आरती: सुबह 6:30 बजे और शाम 6:00 बजे. नवरात्र विशेष: मौसम के अनुसार आरती के समय में हल्का बदलाव होता है। नवरात्र के दौरान यहां 24 घंटे माता का दरबार खुला रहता है। शारदीय नवरात्र में लगभग 10 लाख श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं और अष्टमी के दिन राजपरिवार द्वारा विशेष हवन-पूजन किया जाता है।
