भारत और इस्राइल के अस्तित्व में आने के बाद दोनों देशों के बिच कैसे स्थापित हुआ संबंध

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जैसा की आप सभी जानते है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार (25 फरवरी) को दो दिवसीय दौरे पर इस्राइल रवाना होंगे। पीएम करीब आठ साल बाद इस्राइल जा रहे हैं। इस दौरान पीएम मोदी इस्राइल के अपने समकक्ष बेंजामिन नेतन्याहू और इस्राइली राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग से भी मुलाकात करेंगे। इस्राइली संसद- नेसेट में भी उनका संबोधन हो सकता है। यह पीएम मोदी की दूसरी इस्राइल यात्रा होगी। पहली यात्रा जुलाई 2017 में हुई थी, जो किसी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा यहूदी राष्ट्र की पहली यात्रा थी। ऐसे में यह जानना अहम है कि भारत और इस्राइल का इतिहास क्या है? कैसे इस्राइल के बनने का भारत ने विरोध किया? इसके अस्तित्व में आने के बाद दोनों देशों के रिश्ते कैसे संबंध स्थापित करने तक आगे बढ़े? क्यों कोई प्रधानमंत्री आजादी के बाद से करीब 60 साल तक इस्राइल नहीं गया? दोनों देशों के रिश्ते कब से प्रगाढ़ होना शुरू हुए और तब से अब तक यह संबंध कैसे बढ़े हैं?

वहीं 1920 और 1940 के दशक में यूरोप के कई क्षेत्रों में यहूदियों के खिलाफ अत्याचार बढ़ रहे थे। खासकर जर्मनी में, जहां हिटलर और नाजीवाद के उभार के साथ यहूदी आबादी पर सबसे ज्यादा जुर्म हुए। ऐसे में दुनियाभर में स्थित यहूदियों के बीच अपना एक अलग देश बनाने की मांग उठने लगी। यह देश यरुशलम के आसपास स्थापित किए जाने की आवाजें उठीं, जो कि यहूदी धर्म का प्रमुख केंद्र माना जाता है। हालांकि, उस वक्त फलस्तीन इस्लाम बहुल देश बन चुका था। यह देश उस दौरान ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत आता था।

यहूदियों पर बढ़ते हुए जुर्म को देखते हुए ब्रिटिश शासन ने 1917 के बैलफोर घोषणा (बैलफोर डेक्लेरेशन) में वादा किया कि यहूदियों के लिए फलस्तीन में ही एक अलग देश स्थापित किया जाएगा। हालांकि, फलस्तीन के टुकड़े कर एक अलग देश बनाने का दुनियाभर में पुरजोर विरोध हुआ। खुद ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आने वाले भारत ने उस वक्त यहूदियों का अलग देश बनाने की मांग और इसकी एवज में ब्रिटिश शासन की तरफ से बैलफोर घोषणा का विरोध किया था। इसकी वजह यह थी कि भारत अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई ब्रिटिश शासन से लड़ रहा था, इसलिए वह फलस्तीनी स्वतंत्रता संघर्ष के साथ गहराई से जुड़ा हुआ महसूस करता था।

1930-40 का दौर आते-आते भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी एक प्रमुख चेहरा बन चुके थे। उन्होंने 26 नवंबर 1938 को अपने साप्ताहिक समाचार पत्र ‘हरिजन’ में लिखा था, “फलस्तीन अरबों का है, ठीक उसी तरह जैसे इंग्लैंड अंग्रेजों का और फ्रांस फ्रांसीसियों का है।” हालांकि उन्होंने यूरोप में एडोल्फ हिटलर के अत्याचारों का सामना कर रहे यहूदियों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि यहूदियों को अरबों पर थोपना गलत और अमानवीय होगा।

1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, उसी साल फलस्तीन को एक यहूदी देश (इस्राइल) और एक अरब राज्य (फलस्तीन) में विभाजित करने वाली संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना (यूएन पार्टिशन प्लान) के खिलाफ मतदान किया। किताब- सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू, वॉल्यूम 5 के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र में भारत की तत्कालीन दूत और जवाहरलाल नेहरू की बहन- विजयलक्ष्मी पंडित पर विभाजन के पक्ष में वोट देने के लिए दबाव बनाया गया और उन्हें जान से मारने की धमकियां तक मिली थीं, लेकिन नेहरू सरकार अपने फैसले पर अडिग रही।

भारत ने विभाजन के बजाय यूगोस्लाविया और ईरान के साथ मिलकर एक एकल संघीय राज्य की वकालत की थी। नेहरू का मानना था कि एक ही देश में उन क्षेत्रों को स्वायत्तता दी जानी चाहिए जहां यहूदी और अरब बहुमत में हों। नेहरू ने 1948 में कहा था कि कोई भी समाधान तब तक स्थायी नहीं हो सकता, जब तक वह अरबों और यहूदियों दोनों की सहमति पर आधारित न हो और बलपूर्वक थोपा न जाए।
इस्राइल अलग देश बना, भारत का विरोध जारी रहा

इसी साल संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में मंजूरी मिलने के बाद इस्राइल के गठन के बाद भी भारत का विरोध जारी रहा और 1949 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इस्राइल की सदस्यता के खिलाफ मतदान किया। इन शुरुआती दशकों में भारत का रुख पूरी तरह से फलस्तीनी हितों के समर्थन में और इस्राइल के निर्माण के विरोध में था, जिसे नेहरू ने अरब देशों की भावनाओं को ठेस न पहुंचाने की इच्छा के रूप में भी स्पष्ट किया था।

1950 का दशक: भारत ने इस्राइल को दी मान्यता, पर राजनयिक संबंध नहीं 1950 के दशक में भारत और इस्राइल के संबंधों में एक अहम मोड़ आया। दरअसल, भारत ने इस्राइल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता तो दी, लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए। हालांकि, इस्राइल को सिर्फ मान्यता मिलने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। दरअसल, 1947 में जब इस्राइल अलग-अलग देशों से मान्यता हासिल करने के लिए भरसक कोशिशें कर रहा था। इन्हीं प्रयासों के तहत उसने भारत को मनाने के लिए कई बड़े नेताओं को भेजा। बताया जाता है कि 1947 में ही दुनियाभर में लोकप्रिय वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि वे ताकत की राजनीति की प्रतिद्वंद्विता को समाप्त करें और फलस्तीन में हो रहे यहूदी पुनर्जागरण का समर्थन करें।

बताया जाता है कि शुरुआत में तो नेहरू सहमत नहीं थे, लेकिन बाद में वे इस्राइल को अलग देश के तौर पर स्वीकार करने के लिए तैयार हो गए और इस तरह 17 सितंबर 1950 को भारत ने इस्राइल को मान्यता दे दी। मान्यता देने के बाद नेहरू ने कहा था, “हमने बहुत पहले ही मान्यता दे दी होती, क्योंकि इस्राइल एक वास्तविकता है। हमने ऐसा करने से इसलिए परहेज किया क्योंकि हम अपने अरब मित्र देशों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते थे।”

गौर करने वाली बात यह है कि भारत ने इस्राइल को मान्यता तो दे दी, लेकिन औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित करने से दूरी बनाए रखी। भारत अपनी राजनीतिक और राजनयिक सहानुभूति पूरी तरह से फिलिस्तीनी मुद्दे के साथ रखता था। संबंधों में इस दूरी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अगले चार दशकों तक भारत ने इस्राइल की यात्रा के लिए अपने पासपोर्ट के इस्तेमाल तक पर प्रतिबंध लगा रखा था।

वहीं भारत की राजनीतिक और राजनयिक सहानुभूति पूरी तरह से फिलिस्तीनी हितों के साथ बनी रही। पीएम नेहरू मई में गाजा में तैनात यूएन सैनिकों से मिलने भी पहुंचे। भारत-इस्राइल के रिश्तों में बड़ा मोड़ 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान आया। इस्राइल के पीएम डेविड बेन-गुरियन ने नेहरू को हथियारों की मदद की पेशकश की। भारत ने इस्राइल से हथियार और गोला-बारूद लेना स्वीकार किया, लेकिन अनुरोध किया कि हथियारों की आपूर्ति करने वाले जहाजों पर इस्राइल का झंडा न लगा हो। पीएम नेहरू का इस गुपचुप ढंग से मदद लेने के पीछे का तर्क यह था कि इस्राइल से मदद लेने के एवज अरब देशों के साथ भारत के संबंधों में कड़वाहट न आए। यरूशलम के आर्काइव्स में मौजूद दस्तावेजों के अनुसार, यह भारत और इस्राइल के बीच दशकों तक चलने वाले गुप्त संबंधों की शुरुआत थी। इस्राइल ने भारत के लिए अपनी सैन्य सहायता को जारी रखा और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भी भारत को सैन्य उपकरण और गोला-बारूद की आपूर्ति की। 1970 का दशक: इंदिरा गांधी ने भी नहीं स्थापित किए राजनयिक रिश्ते 1971 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर था, तब फ्रांस में भारत के राजदूत डीएन. चटर्जी ने भारत सरकार को इस्राइल से मदद लेने की सलाह दी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार भी कर लिया। इसके बाद भारत की विदेशी खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ के जरिए लिकटेंस्टीन जैसे देश से इस्राइल से हथियार हासिल करने की शुरुआत हुई।

बताया जाता है कि इस सैन्य सहायता के बदले इस्राइल की तत्कालीन प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर ने इंदिरा गांधी को चिट्ठी लिखकर इस्राइल के लिए औपचारिक राजनयिक मान्यता मांगी थी। 1974 में, भारत पहला गैर-अरब देश बना जिसने फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (पीएलओ) को फलस्तीनी लोगों के इकलौते प्रतिनिधि के तौर पर मान्यता दी। इसके बाद 1975 में पीएलओ ने भारत में अपना कार्यालय खोला। इसी दौरान भारत और फलस्तीन के बीच शैक्षिक स्तर पर भी संबंध मजबूत हुए और हजारों फलस्तीनी छात्र उच्च शिक्षा के लिए भारत आने लगे। 1980 का दशक: इस्राइल की पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों के खिलाफ साझा अभियान की पेशकश 1980 का दशक आते-आते भारत के फलस्तीन और इस्राइल से संबंध पुराने ढर्रे पर ही चलते रहे। जहां भारत खुले तौर पर फलस्तीन का समर्थन करता रहा, वहीं गुपचुप इस्राइल से भी मदद लेता रहा।

इस बीच फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन के नेता यासिर अराफात अक्सर भारत आते रहते थे। 1983 में भारत में रखे गए गुटनिरपेक्ष आंदोलन (एनएएम) के एक शिखर सम्मेलन के दौरान, अराफात ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपनी बहन कहकर संबोधित किया था, जो उस समय भारत और फलस्तीन के बीच के गहरे व्यक्तिगत संबंधों का परिचायक बना। 1980 के दशक की शुरुआत में इस्राइल ने भारत के सामने पाकिस्तान के एक परमाणु केंद्र पर संयुक्त हमले का प्रस्ताव रखा था। हालांकि, भारत ने इस सैन्य सहयोग के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। हालांकि, भारत ने इस्राइल से इस दौरान अपने गुप्त सुरक्षा संबंधों को बनाए रखा।

भारत ने फलस्तीनी संघर्ष के प्रति अपना समर्थन जारी रखते हुए 1988 में फलस्तीन को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी। ऐसा करने वाला भारत दुनिया के पहले गैर-अरब देशों में से एक था। 1990 का दशक: चार दशक बाद स्थापित हुए राजनयिक संबंध दुनियाभर में 1990 का दशक बड़े बदलावों वाला साबित हुआ। दरअसल, इस दौर में सोवियत संघ का पतन हो गया और अमेरिका महाशक्ति के तौर पर स्थापित हुआ। यही वह दौर था, जब भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को खोलना शुरू किया और बहुपक्षवाद की तरफ बढ़ना शुरू किया। इसी कदम के तहत भारत ने जनवरी 1992 में इस्राइल के साथ अपने लंबे समय से चले आ रहे छिपे हुए संबंधों को औपचारिक राजनयिक रिश्तों में बदल दिया। भारत और इस्राइल ने तेल अवीव और नई दिल्ली में अपने दूतावास स्थापित किए।

इसी कड़ी में भारत ने इस्राइल की तरफ से वेस्ट बैंक पर कब्जे के प्रयासों की आलोचना की। इस साल फरवरी में भारत ने 100 से ज्यादा देशों के साथ मिलकर वेस्ट बैंक में इस्राइल के विस्तार की निंदा की। भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन और जनसांख्यिकीय संरचना को बदलने वाले किसी भी कदम का विरोध किया है। इसके अलावा भारत लगातार टू-स्टेट सॉल्यूशन का समर्थन करता रहा है, जिसके तहत फलस्तीन की अपनी पहचान बरकरार रखने की बात कही गई है।