दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2013 के एक सनसनीखेज मामले में आरोपी महिला को अपने नाबालिग भाई से रेप करवाने में मदद करने का दोषी ठहराते हुए 10 साल की सख्त कैद की सजा सुनाई है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी महिला ने परिवार के भरोसे को तोड़ते हुए अपराध में सक्रिय और जानबूझकर भूमिका निभाई। न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा की पीठ ने कहा कि आरोपी महिला ने पीड़िता को नौकरी का झांसा देकर नजफगढ़ के सुनसान इलाके में बुलाया, जहां उसके नाबालिग भाई ने दुष्कर्म किया। अदालत ने पाया कि महिला घटना के दौरान मौके पर मौजूद थी और पीड़िता को धमकाकर चुप रहने के लिए मजबूर भी किया।
अदालत ने महिला को भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत सजाएं सुनाई धारा 376 (रेप) और धारा 109 (उकसाने/सहयोग) के तहत 10 साल की सश्रम कारावास और 50,000 रुपये जुर्माना। धारा 366 (अपहरण/बहला-फुसलाकर ले जाना) के तहत 5 साल की सजा और 20,000 रुपये जुर्माना। धारा 506 (आपराधिक धमकी) और धारा 323 (मारपीट) के तहत अतिरिक्त सजा भी दी गई। सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी, जिससे आरोपी को कुल मिलाकर भारी कड़ी सजा का सामना करना पड़ेगा।
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि आरोपी का आपराधिक इतिहास, जिसमें हत्या का एक मामला भी शामिल है, यह दर्शाता है कि यह कोई एकल घटना नहीं बल्कि लगातार आपराधिक व्यवहार का हिस्सा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में नरमी बरतना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
2013 के नाबालिग रेप मामले में हाईकोर्ट ने एक महिला आरोपी को दोषी ठहराते हुए 10 साल की सश्रम कारावास और अन्य जुर्माने की सजा सुनाई। मामला इसलिए अहम रहा क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने 2015 में संदेह का लाभ देते हुए आरोपी को बरी कर दिया था, लेकिन राज्य सरकार की अपील पर हाईकोर्ट ने 23 फरवरी को उस फैसले को पलट दिया।
कोर्ट ने सजा के साथ जुर्माने की राशि में से 50,000 रुपये पीड़िता को मुआवजे के रूप में देने का आदेश दिया। इसके साथ ही दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को भी निर्देश दिया गया कि वह पीड़िता को अतिरिक्त मुआवजा प्रदान करे। न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा की पीठ ने माना कि पीड़िता ने एक दशक से अधिक समय तक मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक पीड़ा झेली है, इसलिए उसे न्याय के साथ-साथ उचित सहायता मिलना आवश्यक है।
